
एक: श्रीमद्भागवतम् – एक परिचय
बहुधा लोग श्रीमद्भागवत (भागवत महापुराण) और श्रीमद्भगवद्गीता का अन्तर नहीं समझ पाते। वास्तव में, श्रीमद्भागवत 18 पुराणों में से एक पुराण है। इसमें 18 हजार श्लोक हैं। दूसरी तरफ, श्रीमद्भगवद्गीता महाभारत का एक अंश है और इसमें लगभग 700 श्लोक हैं।
श्रीमद्भागवत की रचना की पृष्ठभूमि इसके प्रथम सर्ग में दी गई है। वेदव्यासजी ने वेद के चार विभाग किए। फिर उन्होंने इतिहास एवं पुराण रचे (जिन्हें पाँचवा वेद कहा गया)। जिनसे वेदों का अध्ययन सम्भव नहीं था, उन लोगों की सुविधा के लिए उन्होंने वेदों का सार महाभारत में रख दिया।
किन्तु, जनकल्याण के लिए इतने काम करने के बाद भी वेदव्यासजी को संतुष्टि नहीं मिली।
जब नारदजी से उन्होंने इसका कारण पूछा तो नारदजी ने उन्हें एक ऐसा ग्रंथ लिखने के लिए कहा जिसमें केवल शुष्क ज्ञान ही नहीं हो, बल्कि भक्ति का रस हो। नारदजी की प्रेरणा से वेदव्यासजी ने तब श्रीमद्भागवत की रचना की। इस ग्रंथ के पूरा हो जाने पर उन्होंने सबसे पहले इसे अपने पुत्र शुकदेवजी को सुनाया।
श्रीमद्भागवत में भक्ति, ज्ञान और वैराग्य ही मुख्य कथ्य हैं। इसकी सारी कथायें इसी कथ्य के आसपास बुनी गई हैं। श्रीमद्भागवत को भगवान की साक्षात् वाङ्मयी मूर्ति कहा गया है। यह समस्त वेदों और उपनिषदों का सार है।
यदि हम भूमि में छिपे रत्न को पाना चाहते हैं तो भूमि की खुदाई के दौरान निकली मिट्टी या पत्थर को हमें अनदेखा करना ही पड़ेगा।