Devotional

श्रीमद्भागवतम् – भागवत महापुराण

श्रीमद्भागवत महापुराण भारतीय धर्म और दर्शन का एक अत्यंत महत्वपूर्ण ग्रंथ है, जो भक्ति को जीवन का सर्वोच्च मार्ग मानता है। यह पुराण भगवान विष्णु की महिमा और उनके विभिन्न अवतारों, विशेषकर भगवान श्रीकृष्ण की दिव्य लीलाओं का विस्तार से वर्णन करता है। इसकी भाषा सरल, भावपूर्ण और प्रेरणादायक है, जिससे सामान्य व्यक्ति भी गहरे आध्यात्मिक सिद्धांतों को समझ सकता है।

इस ग्रंथ में कुल 12 स्कंध और लगभग 18,000 श्लोक शामिल हैं। इसमें सृष्टि की उत्पत्ति, ब्रह्मांड की संरचना, समय के चक्र, विभिन्न युगों की कथाएं और महान ऋषियों तथा राजाओं के जीवन प्रसंगों का वर्णन मिलता है। विशेष रूप से दशम स्कंध अत्यंत लोकप्रिय है, जिसमें श्रीकृष्ण के जन्म, बाल लीलाओं, कंस वध, गोपियों के साथ रासलीला और उनके अद्भुत कार्यों का भावपूर्ण चित्रण किया गया है।

भागवत महापुराण का एक प्रमुख उद्देश्य यह सिखाना है कि मनुष्य को अहंकार, लोभ और मोह से मुक्त होकर ईश्वर की शरण में जाना चाहिए। इसमें राजा परीक्षित और शुकदेव जी के संवाद के माध्यम से जीवन और मृत्यु के गहन सत्य को उजागर किया गया है। यह दर्शाता है कि मानव जीवन क्षणभंगुर है, इसलिए इसे धर्म, भक्ति और सदाचार में लगाना चाहिए।

यह ग्रंथ केवल धार्मिक आस्था तक सीमित नहीं है, बल्कि यह जीवन जीने की एक संतुलित और नैतिक दृष्टि भी प्रदान करता है। आज के आधुनिक युग में भी श्रीमद्भागवत महापुराण लोगों को शांति, करुणा, प्रेम और आध्यात्मिक उन्नति की ओर प्रेरित करता है।

ओम् नमो भगवते वासुदेवाय

भूमिका


बहुधा लोग श्रीमद्भागवत (भागवत महापुराण) और श्रीमद्भगवद्गीता का अन्तर नहीं समझ पाते। वास्तव में, श्रीमद्भागवत 18 पुराणों में से एक पुराण है। इसमें 18 हजार श्लोक हैं। दूसरी तरफ, श्रीमद्भगवद्गीता महाभारत का एक अंश है और इसमें लगभग 700 श्लोक हैं।

श्रीमद्भागवत की रचना की पृष्ठभूमि इसके प्रथम सर्ग में दी गई है। वेदव्यासजी ने वेद के चार विभाग किए। फिर उन्होंने इतिहास एवं पुराण रचे (जिन्हें पाँचवा वेद कहा गया)। जिनसे वेदों का अध्ययन सम्भव नहीं था, उन लोगों की सुविधा के लिए उन्होंने वेदों का सार महाभारत में रख दिया।
किन्तु, जनकल्याण के लिए इतने काम करने के बाद भी वेदव्यासजी को संतुष्टि नहीं मिली।
जब नारदजी से उन्होंने इसका कारण पूछा तो नारदजी ने उन्हें एक ऐसा ग्रंथ लिखने के लिए कहा जिसमें केवल शुष्क ज्ञान ही नहीं हो, बल्कि भक्ति का रस हो। नारदजी की प्रेरणा से वेदव्यासजी ने तब श्रीमद्भागवत की रचना की। इस ग्रंथ के पूरा हो जाने पर उन्होंने सबसे पहले इसे अपने पुत्र शुकदेवजी को सुनाया।
श्रीमद्भागवत में भक्ति, ज्ञान और वैराग्य ही मुख्य कथ्य हैं। इसकी सारी कथायें इसी कथ्य के आसपास बुनी गई हैं। श्रीमद्भागवत को भगवान की साक्षात् वाङ्मयी मूर्ति कहा गया है। यह समस्त वेदों और उपनिषदों का सार है।

हमें श्रीमद्भागवत क्यों पढ़ना चाहिए?

• इसमें भगवान श्रीकृष्ण की लीलाओं का विशद वर्णन है।
• इसकी भाषा अद्भुत काव्य-सौंदर्य से भरी पड़ी है।
• इसमें सुन्दर कथाओं के माध्यम से विभिन्न चरित्रों के आपसी सम्वाद में धर्म, राजनीति, दर्शन, गृहस्थ-जीवन आदि जीवन के कई पक्षों के बारे में व्यावहारिक ज्ञान मिलता है।
• इसमें जीवन अपनी संपूर्ण व्यापकता एवं प्रखरता के साथ हमारे सामने आता है।
• किसी भी आदि-ग्रंथ (classic) को मूल रूप में पढ़ने का लाभ यह है कि ग्रंथ और पाठक के बीच सीधा संवाद होता है; व्यर्थ की भ्रांतियां नहीं फैल पातीं।

हमें किसी भी धर्मग्रंथ को पढ़ते समय कुछ बातों का ध्यान रखना चाहिए। प्रथम, हम इनमें वर्णित चरित्रों, घटनाओं, स्थानों आदि की तार्किकता में बहुत न उलझ जाएँ। जो मूल कथ्य है, और जिसकी आज के सन्दर्भ में प्रासंगिकता है, हम उसी पर अपनी दृष्टि रखें।

द्वितीय, हम किसी भी धर्म या ‘वाद ‘(-ism) के अनुयायियों के आचरण के आधार पर उस धर्म के प्रति पूर्वाग्रह न रखें। बहुधा, अनुयायी अल्प-बुद्धि होते हैं और धर्म की व्याख्या अपनी सीमित बुद्धि एवं तत्कालीन स्वार्थ के आधार पर करते हैं। गंगा जब गंगोत्री से निकलती है, इसका जल बिल्कुल शुद्ध होता है, किन्तु, सागर तक जाते-जाते मनुष्य इसे दूषित कर देता है।
प्रत्येक धर्म का धर्मग्रंथ संपूर्ण मानवता की धरोहर होता है।

यदि हम भूमि में छिपे रत्न को पाना चाहते हैं तो भूमि की खुदाई के दौरान निकली मिट्टी या पत्थर को हमें अनदेखा करना ही पड़ेगा।

श्याम चतुर्वेदी

(अगले अंक में – भक्ति की दुर्दशा एवं नारदजी का आगमन)


भगवान श्रीकृष्ण के वैकुण्ठ प्रस्थान करते ही धरती पर सर्वत्र कलियुग ने अपना प्रभाव दिखाना आरंभ कर दिया। धीरे-धीरे राजसत्ता पर दुष्टों ने अधिकार जमा लिया। सामाजिक और नैतिक मूल्यों में तेजी से  ह्रास होने लगा। सत्य, तप, शुचिता, दया, दान के  प्रति लोगों का अब पूर्ववत्  आग्रह नहीं रहा। शिक्षा अब निस्वार्थ ज्ञान-दान न होकर पेट पालने के लिए एक व्यवसाय मात्र होकर रह गई। पवित्र स्थानों और देवालयों की मर्यादा पाखंड के कारण नष्ट हो गई। परिवार की शांति जाती रही और सदस्यों में कलह बढ़ने लगा।

उन दिनों नारदजी पृथ्वी पर विचरण कर रहे थे। उनकी दृष्टि में पृथ्वीलोक सर्वोत्तम लोक था। किंतु, उन्होंने यहाँ जब सर्वत्र कलियुग का ऐसा प्रभाव देखा तो उनका मन खिन्न हो गया।किन्तु, जनकल्याण के लिए इतने काम करने के बाद भी वेदव्यासजी को संतुष्टि नहीं मिली।

कई गाँवों, नगरों, तीर्थों से गुजरते हुए एक दिन वे वृंदावन पहुँचे। वहाँ यमुना नदी के तट पर उन्होंने एक अद्भुत दृश्य देखा – सैकड़ों स्त्रियों से घिरी हुई एक युवती बहुत दुखी होकर रो रही थी। वे स्त्रियाँ उसे पंखा झल रही थीं और कुछ समझा रही थीं, किंतु उसका दुख किसी तरह कम नहीं हो रहा था। उसके पास ही दो मृतप्राय वृद्ध पुरुष लेटे हुए थे जो बड़ी कठिनाई से साँस ले पा रहे थे। वह युवती उन्हें बार-बार जगाने का प्रयास करती थी और प्रत्येक बार असफल होकर असहाय भाव से रोती जाती थी।

नारदजी ने करुणावश उसके समीप जाकर उससे पूछा – देवि! तुम कौन हो? तुम्हारे आसपास ये स्त्रियाँ कौन हैं? ये दोनों वृद्ध पुरुष कौन हैं? और, तुम्हारे दुख का कारण क्या है?

युवती ने उत्तर दिया – मुनिवर! मैं भक्ति हूँ। ये स्त्रियाँ गंगा आदि पवित्र नदियाँ हैं जो मेरी सेवा के लिए यहाँ आई हैं। ये दोनों वृद्ध पुरुष वास्तव में ज्ञान और वैराग्य नामक मेरे दो पुत्र हैं। कलियुग के आगमन से हम तीनों को असमय ही बुढ़ापे ने आ घेरा। इस व्याधि के उपचार की आशा में हमलोग भटकते हुए यहाँ वृंदावन पहुँचे जहाँ अतीत में भगवान श्रीकृष्ण की सैकड़ों लीलाएं हो चुकी हैं।

भक्ति ने आगे कहा – यहाँ पहुँचते ही एक चमत्कार हुआ। मेरा बुढ़ापा जाता रहा और मैं फिर से युवती हो गई। किंतु, आश्चर्य की बात यह है कि मेरे दोनों पुत्र वृद्ध ही रह गए!

भक्ति की बात सुनकर नारदजी कुछ क्षण मौन रहे। फिर कुछ सोचते हुए-से बोले – देवि! इसमें आश्चर्य की कोई बात नहीं है। वृंदावन में अभी भी भक्ति के उपयुक्त वातावरण है। किंतु यहाँ ज्ञान और वैराग्य की कोई पूछ नहीं है। यही कारण है कि यहाँ आकर तुम्हें तो तुम्हारा यौवन मिल गया, किंतु तुम्हारे ये दोनों पुत्र कलियुग के प्रभाव से मुक्त नहीं हो पा रहे हैं।

हाय रे कलियुग! भक्ति ने क्षुब्ध स्वर में कहा – राजा परीक्षित इस दुष्ट कलियुग को मार सकते थे, फिर उन्होंने इसे जीवनदान क्यों दे दिया?

नारदजी ने उत्तर दिया – क्योंकि राजा परीक्षित विवेकवान थे। उन्हें कलियुग की कुछ उन विशेषताओं के बारे में पता था जो अन्य युगों में नहीं थीं। कलियुग का सबसे बड़ा लाभ यह है कि अन्य युगों में जो फल अत्यंत कठिन तप, योग, समाधि आदि साधनों से मिलते थे, वे ही फल कलियुग में भगवान श्रीकृष्ण के कीर्तन मात्र से मिल जाते हैं। इस युग में मुक्तिकामी जीवों की इसी सुविधा को देखते हुए राजा ने कलियुग को जीवित रहने दिया।

( मूल ग्रंथ पर आधारित)

श्याम चतुर्वेदी

(अगले अंक में – सनकादि द्वारा भागवत पाठ एवं भक्ति का उद्धार)

(अब तक  –  कलियुग के प्रभाव से भक्ति के दोनों पुत्र ज्ञान और वैराग्य असमय वृद्ध हो गए। उन्हें लेकर वह वृंदावन आ गई। वहाँ एक दिन उसकी भेंट नारदजी से हुई। उसने नारदजी से इस बारे में सहायता की विनती की।)

भक्ति ने कुछ ठहर कर कहा – मुनिवर! मैं धन्य हुई जो आज आपके दर्शन हुए। अब आप ही बतायें कि मेरा दुख कैसे दूर हो।

नारदजी ने भक्ति को धैर्य बंधाते हुए कहा- भक्ति! तुम व्यर्थ दुखी हो रही हो। तुम तो सदा से भगवान की प्रिय रही हो। उनकी ही आज्ञा से तुम अपने पुत्रों ज्ञान और वैराग्य के साथ युगों से भगवान के भक्तों का पोषण करती रही हो। मुक्ति तुम्हारी दासी रही है। कलियुग में तो तुम्हारा महत्व और बढ़ गया है। इस युग में मुक्ति पाने के लिए व्रत, तीर्थ, योग, ज्ञान, वैराग्य, यज्ञ आदि कठिन साधनों की कोई आवश्यकता नहीं है; एकमात्र भक्ति ही पर्याप्त है। तुम धैर्य रखो, मैं घर-घर में प्रत्येक व्यक्ति के हृदय में तुम्हारी प्रतिष्ठा कर दूँगा। 

नारदजी की बातें सुनकर भक्ति में आशा का संचार हुआ। उसने नारदजी से अनुरोध किया – मुनिवर, आप कुछ ऐसा उपाय करें कि मेरे पुत्रों का यौवन पुनः लौट आए।

नारदजी ने शास्त्रों का साधन अपनाया। उन्होंने ज्ञान और वैराग्य को उनकी पूर्व अवस्था में लाने के लिए वेद, वेदांत, गीता सबका पाठ किया, कई बार पाठ किया, परंतु उनकी अवस्था में कोई सुधार नहीं हुआ। नारदजी को समझ में नहीं आया कि उनके प्रयत्नों में कमी कहाँ रह गई!

इसी उलझन में नारदजी ज्ञान और वैराग्य को वहीं छोड़कर तीर्थ यात्रा पर निकल पड़े। उन्होंने प्रत्येक तीर्थ पर मुनियों से अपनी समस्या का समाधान पूछा किन्तु कोई भी उनके प्रश्न का स्पष्ट उत्तर नहीं दे सका।

इस तरह विभिन्न तीर्थों में विचरण करते हुए जब वे बदरीवन पहुंचे तो उनकी  भेंट सनकादि मुनियों से हुई। 

[सनकादि (सनक +आदि) मुनियों के नाम हैं – सनक, सनन्दन, सनातन और सनतकुमार। ये सभी ब्रह्मा के परम ज्ञानी, आजीवन ब्रह्मचारी पुत्र हैं। ये सदा शिशुओं की आयु में ही रहते हैं।]

नारदजी ने उन्हें भक्ति की दुर्दशा एवं उसकी सहायता करने में अपनी विफलता के बारे में बताकर उनसे विनती की – आप मुनिजन कृपया मुझे बताएँ कि इस विषय में अब क्या किया जा सकता है। साथ ही,  समाज के हर वर्ण में (सर्ववर्णेषु) भक्ति की प्रतिष्ठा कैसे की जा सकती है?

सनकादि ने उत्तर दिया -ये दोनों बातें एकमात्र  श्रीमद्भागवत के पाठ से ही संभव हैं –

“प्रलयं हि गमिष्यन्ति श्रीमद्भागवतध्वनेः। 

कलेर्दोषा इमे सर्वे सिंहशब्दाद् वृका इव ।।”

(सिंह की गर्जना से जैसे भेड़िये भाग जाते हैं, उसी प्रकार जहाँ श्रीमद्भागवत की ध्वनि होती है वहाँ कलियुग के दोष नहीं टिक पाते हैं।)

सनकादि की बातों पर नारदजी को सहसा विश्वास नहीं हुआ। थोड़ी हिचक के साथ उन्होंने कहा- मैंने वेद, वेदांत, गीता सब का प्रयोग करके देख लिया, किन्तु ज्ञान और वैराग्य पर इनका कोई प्रभाव नहीं पड़ा। फिर भला श्रीमद्भागवत सुनाने से वे कैसे जग जायेंगे? श्रीमद्भागवत में भिन्न क्या है? इसके प्रत्येक श्लोक में  वेदों का सारांश ही तो है?

सनकादि ने उत्तर दिया – नारदजी, आपकी शंका उचित है। आप इसे इस तरह समझें – यद्यपि घी दूध से निकलता है, किन्तु इसका स्वाद दूध से अलग होता है। रस यों तो वृक्ष के हर भाग में होता है, किन्तु फल में संचित होकर यह विशेष मधुर हो जाता है। ईख से निकाली गई शर्करा ईख से अधिक मधुर होती है। ठीक इसी तरह यद्यपि श्रीमद्भागवत वेद, वेदांत, गीता का ही सार है, किन्तु यह उन सबसे अलग और अधिक मधुर है।

सनकादि ने आगे कहा – नारदजी ! आप क्या भूल गए कि जब वेदों, वेदांत, गीता की रचना करके भी व्यासदेव के चित्त को शांति नहीं मिली थी, तब आपने ही उन्हें चार श्लोकों में श्रीमद्भागवत का उपदेश देकर और भक्ति का महत्व समझा कर उनकी सारी चिंता दूर कर दी थी?

नारदजी बोले – महानुभावो, मैं सारी बातें समझ गया। अब आप हमें यह बतायें कि श्रीमद्भागवत कथा के आयोजन के लिए सबसे उपयुक्त कौन-सा स्थान है?

सनकादि ने उत्तर दिया – हरिद्वार के पास गंगा तट पर एक अत्यंत सुरम्य घाट है। वहाँ कई तपस्वी ऋषियों का निवास है। उनके तप के प्रभाव से वहां आसपास रहने वाले जीवों में पारस्परिक स्वभावगत वैर भी नहीं है। आप श्रीमद्भागवत कथा का वहीं आयोजन कराएं। 

गंगा तट पर सनकादि द्वारा भागवत-कथा सुनाई जाएगी, यह सूचना पाते ही विभिन्न लोकों से भृगु, वसिष्ठ, च्यवन, गौतम, परशुराम, विश्वामित्र, मार्कण्डेय, दत्तात्रेय, पिप्पलाद, व्यास, पराशर, आदि ऋषिगण अपने परिवार एवं शिष्यों के साथ वहाँ के लिए चल पड़े। सारे वेद, वेदांत, मंत्र-तंत्र, पुराण भी मूर्तिमान होकर वहाँ आ गए।  गंगा आदि नदियाँ, सारे तीर्थ, सारी दिशाएँ, सारे वन, सारे पर्वत, देव, गन्धर्व, दानव आदि भी  कथा सुनने के लिए वहाँ उपस्थित हो गए।

कथा सुनाने के लिए सनकादि ने अपना आसन ग्रहण किया। श्रोताओं में नारदजी, वैष्णव, वैरागी, संन्यासी और ब्रह्मचारी सबसे आगे बैठे।

कथा प्रारम्भ करते हुए सनकादि ने कहा – श्रीमद्भागवत की महिमा अपार है। इस ग्रन्थ में १८ हजार श्लोक और १२ स्कंध हैं। यह शुकदेवजी एवं राजा परीक्षित के संवाद के रूप में है। इसे यदि कोई एकाग्रचित्त होकर शुद्ध मन से और आत्मसंयम के साथ सुने तो  उसे मुक्ति मिल जाती है। फल की दृष्टि से यह सभी तीर्थों एवं यज्ञों से बढ़कर है। यह भगवान की साक्षात् वाङ्मयी मूर्ति है। 

अभी सनकादि श्रीमद्भागवत की महिमा का वर्णन कर ही रहे थे कि भक्ति अपने दोनों पुत्रों के साथ वहाँ प्रकट हो गई। उसके दोनों पुत्र ज्ञान और वैराग्य पुनः तरुण हो गए थे। भक्ति ने श्रीमद्भागवत के अर्थों का आभूषण पहन रखा था। वह बार-बार भावविभोर होकर ‘श्रीकृष्ण!’, ‘गोविन्द!’, ‘हरे!’, ‘मुरारे!  ‘हे नाथ!’ आदि भगवान के कई नामों का उच्चारण करती जाती थी।

भक्ति के इस दिव्य रूप को देखकर श्रोता-सभा विस्मय-विमुग्ध हो गई। सनकादि ने श्रोता-सभा को सूचित करते हुए कहा – यह भक्ति देवी हैं जो अभी-अभी कथा के अर्थ से निकली हैं!

भक्ति ने तब विनम्रतापूर्वक सनकादि से पूछा – मुनिगण! मैं कलियुग में लगभग नष्ट हो चली थी। आपने श्रीमद्भागवत कथा के अमृत से सींचकर मुझे पुनर्जीवन दे दिया। अब आप ही बताएं कि मैं कहाँ रहूँ?

सनकादि ने कहा – अब तुम हरिभक्तों के ह्रदय में निवास करो। वहाँ कलियुग तुम्हे छू तक नहीं सकेगा।

सनकादि का निर्देश पाकर भक्ति उसी क्षण भगवद्भक्तों के हृदय में प्रवेश कर गई। अपने हृदय में भक्ति के विराजते ही वहाँ उपस्थित भक्तों ने भगवान के दिव्य रूप के दर्शन कर लिए। सर्वत्र भक्ति का रस कुछ ऐसा उमड़ा कि किसी को अपने तन-मन की सुध नहीं रही।  

श्रीमद्भागवत कथा का ऐसा प्रभाव देखकर नारदजी अपना कौतूहल रोक न पाए। उन्होंने सनकादि से यह जिज्ञासा की कि श्रीमद्भागवत के श्रवण से किस तरह के लोग शुद्ध हो जाते हैं?

नारदजी के इस प्रश्न के उत्तर में सनकादि ने कहा – इस बारे में में हम आपको एक प्राचीन कथा सुनाते हैं।

(मूल ग्रंथ पर आधारित)

(अगले अंक में – धुंधुकारी की कथा)

श्याम चतुर्वेदी 

(अगले अंक में – भक्ति की दुर्दशा एवं नारदजी का आगमन)

(अब तक – नारदजी के यह प्रश्न करने पर कि किस तरह के लोगों को श्रीमद्भागवत सुनने से लाभ होता है, सनकादि ने यह कहानी सुनाई।)

सनकादि ने कहानी शुरू की –

किसी समय तुंगभद्रा नदी के तट पर बसे एक नगर में आत्मदेव नामक ब्राह्मण रहता था। वह समस्त शास्त्रों का ज्ञाता, धर्मपरायण और धन-धान्य से संपन्न था। परन्तु, उसे एक ही दुःख था – वह संतानहीन था।

एक दिन घोर निराशा में भरकर आत्मदेव अपने घर से निकलकर वन की ओर चल पड़ा। रास्ते में उसकी भेंट एक संन्यासी से हुई। जब संन्यासी ने उसके दुःख का कारण पूछा तो उसने अपनी दुखगाथा सुनानी शुरू कर दी – मैं क्या बताऊँ! मेरी कोई संतान नहीं है। मैं इतना अभिशप्त हूँ कि मैं जिस गाय को पालता हूँ, वह गाय भी बाँझ हो जाती है। मैं जो वृक्ष लगाता हूँ उस पर भी फल नहीं लगते। अब ऐसे जीवन से क्या लाभ? मैं यही सोचकर आज प्राण त्यागने के लिए घर से निकला हूँ।

संन्यासी ने योगबल से इसका कारण जान लिया। फिर उसने आत्मदेव को समझाते हुए कहा – ब्राह्मण! तुम संतान पाने की लालसा छोड़ दो। तुम्हारे पिछले जीवन के कुछ कर्मों के कारण अगले सात जन्मों तक तुम्हारी कोई संतान नहीं हो सकती। वैसे भी, संतान सदा सुख ही देनेवाली हो, ऐसा नहीं होता।

परन्तु, आत्मदेव के ऊपर संन्यासी की इन बातों का कोई प्रभाव नहीं पड़ा। उसने कहा – महाराज, मुझे इस ज्ञान से कोई लेना-देना नहीं है। जैसे भी हो, आप मुझे संतान प्राप्ति का उपाय बताएँ, नहीं तो मैं इसी क्षण आपके सामने ही अपने प्राण त्याग दूँगा!

आत्मदेव के इस हठ को देखकर संन्यासी ने कहा – विधि के लेख को मिटाने का प्रयत्न करनेवाला सदैव दुःख पाता है। किन्तु, तुम्हारे दुराग्रह ने मुझे कुछ करने को विवश कर दिया है।

यह कहकर संन्यासी ने आत्मदेव को एक फल दिया और उसे अपनी पत्नी को खिला देने के लिए कहा। साथ ही, उसने यह भी निर्देश दिया कि उसकी पत्नी एक वर्ष तक सत्य, शुचिता, दया और दान के व्रत का निष्ठापूर्वक पालन करे। वह दिन में केवल एक बार भोजन करे। यदि वह ऐसा करेगी तो उससे जन्म लेनेवाला बालक बहुत शुद्ध स्वभाव का होगा।

आत्मदेव बहुत प्रसन्न मन से वह फल लेकर अपने घर पहुँचा। उसने अपनी पत्नी धुन्धुली को उस संन्यासी की सारी बातें बताईं। किन्तु, धुन्धुली के मन में कुछ और विचार चल रहे थे। एक वर्ष तक कठिन व्रतपालन, गर्भधारण और फिर संतान को जन्म देने के कष्ट की कल्पना से ही वह काँप गई।

धुन्धुली ने अपनी चिंता अपनी बहन को बताई। उसकी बहन ने सुझाव दिया – देख, मैं इस समय गर्भवती हूँ। प्रसव होने पर मैं अपना बच्चा तुझे दे दूँगी। इस बीच तुझे बस गर्भवती होने का अभिनय करते रहना है। लोगों को यह विश्वास दिलाने के लिए कि यह बच्चा तेरा ही है, हम सर्वत्र प्रचार कर देंगे कि मेरा बच्चा मर गया। रही बात मेरे पति की, तो वह लोभी है। तुम उसे कुछ धन दे दोगी तो वह कभी भी यह भेद नहीं खोलेगा। और, जहाँ तक इस फल का प्रश्न है, इसे अपनी गाय को खिला दे। हम भी देख लेंगे कि इसका क्या प्रभाव पड़ता है!

सबकुछ धुन्धुली और उसकी बहन की योजना के अनुसार चलता रहा। समय आने पर जब धुन्धुली की बहन को बच्चा हुआ तो उसके पति ने चुपचाप उस बच्चे को धुन्धुली को सौंप दिया। धुन्धुली ने एक पुत्र को जन्म दिया है, यह समाचार सुनकर आत्मदेव और उसके परिजनों के आनंद की सीमा न रही।

धुन्धुली ने अपने पति से निवेदन किया कि उसे दूध नहीं उतर रहा है। क्यों न वह अपनी बहन को बुलाकर अपने साथ रख ले? उसकी बहन का बच्चा अभी हाल में ही मरा है। वह संभवतः इस बच्चे को दूध पिला सके।

आत्मदेव ने बिना किसी आपत्ति के उसकी यह बात मान ली। उसे सत्य का पता न था।

धुन्धुली ने बच्चे का नाम धुंधुकारी रखा।

उधर संन्यासी के फल के प्रभाव से आत्मदेव की गाय ने एक सुन्दर बच्चे को जन्म दिया। वह बालक मनुष्य के रूप में ही था। उसके कान देखने में गाय के कानों की तरह थे। आत्मदेव ने उसका नाम गोकर्ण रखा।

समय के साथ दोनों बच्चे बड़े होने लगे। गोकर्ण पंडित, ज्ञानी और सदाचारी थे। किन्तु, धुंधुकारी अत्यंत दुष्ट प्रकृति का निकला। चोरी करना, दूसरों के घर में आग लगा देना, निर्दोष जीवों का शिकार करना – ऐसे ही कामों में उसे आनंद आता था। उसने कुसंगति में पड़कर अपने पिता की समस्त संपत्ति नष्ट कर दी। अपने इस पुत्र के आचरण से अत्यंत दुखी होकर आत्मदेव बार- बार अपने भाग्य को कोसने लगा कि ऐसे पुत्र की प्राप्ति से तो निसंतान होना ही अच्छा था!

अपने पिता की ऐसी मनःस्थिति देखकर एक दिन गोकर्ण ने उसे समझाया – पिताजी, यह संसार असार है। इसमें आसक्त मनुष्य सिवाय दुःख के और कुछ नहीं पाता। धन किसका? पुत्र किसका? यह शरीर हड्डी, मांस, रक्त से बना एक पिंड मात्र ही तो है? इस शरीर को आप ‘ मैं ‘ मानना छोड़ दें। इस संसार की प्रत्येक वस्तु क्षणभंगुर है। आप इसमें आसक्त न हों। आपके लिए यही उचित है कि आप साधुओं की सेवा करें और भगवान का भजन करें। दुःख से मुक्ति का यही उपाय है।

पुत्र गोकर्ण की बातें सुनकर आत्मदेव के मन में वैराग्य आ गया। उसने घर छोड़ दिया और वन में जाकर भगवान श्रीकृष्ण की भक्ति करते हुए अपना शेष जीवन बिता दिया।

पिता के घर छोड़ देने के बाद धुंधुकारी बिलकुल निरंकुश हो गया। उसके अत्याचारों से दुखी होकर एक दिन उसकी माँ कुँए में गिरकर मर गई।

गोकर्ण भी तीर्थयात्रा पर निकल गए।

धुंधुकारी के पापाचरण का कोई अंत नहीं था। वह पाँच दुश्चरित्र स्त्रियों को अपने घर ले आया और उन्हीं के साथ रहने लगा। उनके लिए तरह-तरह की भोग- सामग्रियां जुटाना ही उसके जीवन का उद्देश्य हो गया।

एक दिन वह उन स्त्रियों के कहने पर कहीं से चोरी करके बहुत सारे वस्त्र और आभूषण ले आया। चोरी की सामग्री देखकर उन स्त्रियों ने आपस में विचार किया कि ऐसे कुकर्म करता हुआ धुंधुकारी एक दिन अवश्य ही पकड़ा जाएगा। तब राजा इसका सारा धन वापस लेकर इसे प्राणदंड दे देगा। ऐसी स्थिति आने से पहले ही यदि इसे मार डाला जाए तो यह सारा धन हमारे पास ही रह जाएगा। ऐसा निश्चय करके उन्होंने सोए हुए धुंधुकारी को रस्सियों से बांधकर उसे फाँसी लगा दी। जब वह फाँसी से नहीं मरा तो उसके मुख में उन्होंने जलते हुए अंगारे डाल दिए। धुंधुकारी बहुत कष्ट भोगता हुआ मर गया।

(मूल ग्रंथ पर आधारित)

श्याम चतुर्वेदी

(अगले अंक में – धुंधुकारी की मुक्ति)

अपने कुकर्मों के कारण हुई अस्वाभाविक मृत्यु के बाद धुंधुकारी एक भयानक प्रेत बना। वह बवंडर की तरह दसों दिशाओं में भटकने लगा। सदा सर्दी-गर्मी और भूख-प्यास से व्याकुल होने के कारण उसे कहीं भी चैन नहीं मिलता था।

कई महीनों की तीर्थ यात्रा के बाद गोकर्ण अपने घर लौटे। रात में जब वे आँगन में सोने गए तो धुंधुकारी भी वहाँ चला आया। उसने कभी भेड़ा, कभी हाथी, कभी भैंसा, कभी इंद्र, कभी अग्नि बनकर गोकर्ण को अपनी उपस्थिति दिखानी शुरू की। अंत में वह एक मनुष्य के रूप में उनके सामने प्रकट हुआ।

गोकर्ण उसे पहचान न पाए। उन्होंने उससे सहानुभूतिपूर्वक पूछा – तू कौन है? तेरी यह अवस्था कैसे हो गई? तू प्रेत है, पिशाच है या कोई मायावी राक्षस है?

धुंधुकारी ने तब रोते-रोते अपनी सारी कहानी* सुनाई। (*कृपया मेरा पिछला blog क्रम 4 – धुंधुकारी की कथा भाग-1 देखें। )

उसकी बातें सुनकर गोकर्ण ने कहा – मैंने अपनी तीर्थयात्रा के समय तुम्हारी मृत्यु का समाचार सुना था। उसके बाद मैंने सारे तीर्थों में, यहाँ तक कि गया तीर्थ में भी, तुम्हारे लिए विधिवत पिण्डदान किया। मुझे आश्चर्य है कि तुम्हें अब तक मुक्ति क्यों नहीं मिली! अब तुम ही बताओ, तुम्हारे लिए और क्या किया जा सकता है?

धुंधुकारी बोला – भाई, मुझे कुछ नहीं पता। मैं केवल इतना जानता हूँ कि चाहे वह गया हो या और कोई तीर्थ, मेरे चाहे जितने श्राद्ध कर लो, मेरी मुक्ति नहीं हो सकती। अब तुम ही इसका कोई और उपाय सोचो।

गोकर्ण ने रात भर इस विषय पर विचार किया। अगले दिन उन्होंने विद्वानों की भी राय ली, किन्तु कोई इसका समाधान नहीं दे सका ।

गोकर्ण ने तब सूर्यदेव की आराधना की। सूर्यदेव ने स्पष्ट स्वरों में कहा – श्रीमद्भागवत के सप्ताह-पारायण से ही धुंधुकारी को मुक्ति मिल सकती है।

गोकर्ण ने तदनुसार श्रीमद्भागवत कथा प्रारम्भ की। इस कथा को सुनने के लिए दूर-दूर से लोग वहाँ पहुँच गए। धुंधुकारी भी वायु के रूप में वहाँ आ गया और एक सात गाँठ वाले बाँस के भीतर प्रवेश कर गया।

पहले दिन की संध्या को, जब उस दिन की कथा को विराम दिया गया, एक विचित्र घटना घटी। जिस बाँस में धुंधुकारी वायु बनकर छिपा बैठा था, उसकी एक गाँठ बहुत जोर की ध्वनि करती हुई फट गई।

यही क्रम चलता रहा। जैसे-जैसे श्रीमद्भागवत कथा आगे बढ़ती गई, प्रत्येक दिन उस बाँस की एक-एक गाँठ फटती चली गई। सप्ताह के अंतिम दिन जब श्रीमद्भागवत का पारायण पूरा हुआ, बाँस की सातवीं गाँठ को फाड़कर धुंधुकारी दिव्य रूप धारण करके सबके सामने प्रकट हो गया। वह अब प्रेतयोनि से सदा के लिए मुक्त हो चुका था।

धुंधुकारी ने अपने भाई गोकर्ण को आदरसहित प्रणाम किया और कहने लगा – भाई, तुमने श्रीमद्भागवत की कथा सुनाकर मुझे प्रेत योनि से मुक्ति दिला दी है। यह सच है कि जिस तरह आग लकड़ियों को जला डालती है, उसी तरह श्रीमद्भागवत कथा हमारे पापों को भस्म कर देती है। वह मनुष्य बहुत अभागा है जो दिन-रात रोग-दुःख से युक्त अपने क्षणभंगुर शरीर में ही आसक्त रहता है और अपनी मुक्ति के लिए प्रयत्न नहीं करता।

जिस समय धुंधुकारी ये बातें कर रहा था, उसी समय वैकुण्ठ लोक से भगवान् के पार्षद उसके लिए एक दिव्य विमान लेकर वहाँ उपस्थित हो गए।

श्रीमद्भागवत कथा का ऐसा प्रभाव देखकर गोकर्ण को प्रसन्नता तो हुई, किन्तु उनके मन में एक संशय ने भी जन्म लिया। उन्होंने पार्षदों से पूछा – पार्षदगण! आप कृपया मेरी एक शंका का समाधान करें। श्रीमद्भागवत की कथा यहाँ बैठे सारे लोगों ने सुनी, किन्तु इसके फल में ऐसा भेद क्यों हुआ? धुंधुकारी को तो मुक्ति मिल गई, किन्तु बाकी लोगों को मुक्ति क्यों नहीं मिली?

पार्षदों ने उत्तर दिया – हे गोकर्ण! यह सत्य है कि इस कथा को सबने सुना, परन्तु किसी ने धुंधुकारी की तरह इसका मनन नहीं किया। धुंधुकारी ने स्थिरचित्त से कथा सुनी और उस पर अच्छी तरह मनन भी किया। सुनिए –

अदृढ़ं च हतं ज्ञानं प्रमादेन हतं श्रुतं।

संदिग्धो हि हतो मंत्रो व्यग्रचित्तो हतो जपः।।

(ज्ञान यदि दृढ न हो तो वह नष्ट हो जाता है। इसी तरह प्रमाद से श्रवण, संदेह होने से मंत्र और मन के भटकते रहने से जप व्यर्थ हो जाता है।)

यदि बाकी लोग भी विश्वास और एकाग्रता से श्रीमद्भागवत कथा सुनें तो उनकी मुक्ति अवश्य होगी। और, हे गोकर्ण! आप जैसे पुण्यात्मा को अपने लोक ले जाने के लिए तो स्वयं भगवान ही यहाँ पधारेंगे।

यह कहकर धुंधुकारी को अपने साथ लेकर हरिकीर्तन करते हुए पार्षद वैकुण्ठ लोक चले गए।

श्रावण-मास में गोकर्ण ने एक बार फिर श्रीमद्भागवत कथा कही। इस बार सबने दृढ़तापूर्वक अपने चित्त की पूरी एकाग्रता के साथ कथा सुनी।

कथा के संपन्न होने पर स्वयं भगवान वहाँ पधारे। उन्होंने गोकर्ण का आलिंगन करके उनका अपने समान ही स्वरूप बना दिया। बाकी श्रोताओं को भी दिव्य रूप मिल गया। उस गाँव में जितने मनुष्य एवं जीव थे, गोकर्ण की प्रार्थना से उनको भी भगवान् के विमान पर स्थान मिला। फिर वे सारे लोग भगवान के साथ वैकुण्ठलोक को चले गए।

(मूल ग्रंथ पर आधारित)

श्याम चतुर्वेदी

(अगले अंक में – नैमिषारण्य में ऋषियों की सभा)

प्रथम स्कंध

कलियुग में प्राणियों का कल्याण कैसे हो – इस पर विचार करने के लिए एक बार नैमिषारण्य में शौनक आदि ऋषियों की  दीर्घकालिक सभा हुई। सूतजी वक्ता के आसन पर विराजमान हुए। 

ऋषियों ने उनसे निवेदन किया – सूतजी! आपने समस्त धर्मशास्त्रों का अध्ययन किया है। साथ ही साथ आपने उनको आत्मसात् भी किया है। आपका हृदय सरल एवं शुद्ध है। इस कारण आप पर गुरूजनों की कृपा रही है।  हमारी जिज्ञासा है – एक तो कलियुग के प्राणियों की आयु, साधना की क्षमता और बुद्धि कम है, और, दूसरी तरफ विभिन्न शास्त्रों के विभिन्न मत हैं। ऐसे में, लोग किस शास्त्र का अनुकरण करें, यह उन्हें समझ में नहीं आता। इस विषय  में आप कृपया हमारा मार्गदर्शन करें। 

ऋषियों की बात सुनकर सूतजी ने प्रसन्न  होकर  कहा  – ऋषिगण, विश्वकल्याण के लिए आपने बहुत सुन्दर जिज्ञासा की है। वास्तव में, श्रीमद्भागवत ही वह ग्रन्थ है जो कलियुग में सब के लिए कल्याणकारी है। यह समस्त वेदों का सार है। यह संसार में अज्ञान के अंधकार से मुक्ति दिलानेवाला दीपक है। इसे सुनने से भगवान श्रीकृष्ण के प्रति निष्काम भक्ति बढ़ती है एवं रजोगुण तथा तमोगुण के भाव नष्ट हो जाते हैं। फिर शुद्ध सत्त्व में स्थित होने से भगवान के तत्त्व का ज्ञान हो जाता है। भगवान के प्रति भक्ति होते ही मन में अपने-आप ज्ञान और वैराग्य का भाव आ जाता है। हृदय की समस्त ग्रंथियां नष्ट हो जाती हैं, सारे संदेह मिट जाते हैं और जीव अपने सारे कर्म-बन्धनों से मुक्त हो जाता है। 

परमात्मा एक ही हैं। किन्तु, उन्होंने संसार की स्थिति, उत्पत्ति एवं नाश के लिए प्रकृति के तीन गुणों – सतोगुण, रजोगुण, तमोगुण – के अनुरूप क्रमशः विष्णु, ब्रह्मा एवं महेश का रूप धारण किया है। महात्माओं द्वारा भगवान के सत्त्वमय रूप विष्णु की आराधना को सर्वश्रेष्ठ बताया गया है क्योंकि यही निष्काम भक्ति है। 

वास्तव में, वेदों में वर्णित ज्ञान का चरम लक्ष्य भगवान श्रीकृष्ण ही हैं। समस्त यज्ञ उनके लिए हैं। समस्त योग, कर्म और तप उनके निमित्त हैं। समस्त कर्म उन्हीं में मिलकर समाप्त हो जाते हैं। 

वासुदेवपरा वेदा वासुदेवपरा मखाः।

वासुदेवपरा योगा वासुदेवपराः क्रियाः।।

वासुदेवपरं ज्ञानं वासुदेवपरं तपः।

वासुदेवपरो धर्मो  वासुदेवपरा गतिः।।

परमात्मा एक ही हैं। किन्तु, वे भिन्न-भिन्न प्राणियों में उसी तरह अलग-अलग रूपों में दिखाई पड़ते हैं जैसे एक ही अग्नि भिन्न-भिन्न लकड़ियों में अलग-अलग रूप में दीखती है।

इसी तरह भगवान के अवतारों के बारे में समझना चाहिए। जैसे  किसी अक्षय सरोवर से छोटे-बड़े हजारों नदी-नाले निकलते हैं, वैसे ही भगवान के असंख्य अवतार होते हैं। जहाँ तक अन्य अवतारों का प्रश्न हैं, वे सभी भगवान के अंश मात्र हैं, किन्तु भगवान श्रीकृष्ण तो स्वयं भगवान ही हैं। 

यह सारा ब्रह्माण्ड भगवान की लीला मात्र है जिसका वे सृजन, पालन और संहार करते हैं। परन्तु, इस सारी प्रक्रिया में वे स्वयं कभी लिप्त नहीं होते। वे समस्त जीवों के भीतर होते हुए भी उनसे स्वतंत्र हैं। 

वेदव्यासजी ने समस्त वेदों, इतिहास ग्रंथों का सार श्रीमद्भागवत में रखा एवं सारे प्राणियों के कल्याण के लिए अपने पुत्र शुकदेवजी को इसका ज्ञान कराया। बाद में शुकदेवजी ने राजा परीक्षित को इसकी कथा सुनाई। सौभाग्यवश, जब शुकदेवजी राजा परीक्षित को श्रीमद्भागवत सुना रहे थे, मैं भी वहाँ उपस्थित था। मैं अपनी बुद्धि से इस कथा का जो भी अर्थ समझ सका, आपलोगों को वही सुनाऊँगा।  

शौनकजी ने कहा – सूतजी! आप बड़े भाग्यशाली हैं जो आपने यह कथा शुकदेवजी के मुख से सुनी। आप हमें  बताएँ कि यह कथा किस युग में, किस स्थान पर और किस सन्दर्भ में सुनाई गई थी? हमें यह बात और आश्चर्यजनक लगती है कि  सदा मौन धारण करनेवाले, सांसारिक लोगों से दूर रहनेवाले, आत्मा ही आत्मा में लीन रहनेवाले शुकदेवजी ने कैसे राजा परीक्षित को श्रीमद्भागवत कथा सुनाना स्वीकार कर लिया! शुकदेवजी को हम  सादर प्रणाम करते हैं। वे इतने पवित्र हैं कि उनके चरण जिस घर के द्वार पर पड़ें, वह घर तीर्थ बन जाता है। वे गृहस्थों के द्वार पर उतनी ही देर रुकते हैं जितनी देर में एक गाय दुही जाती है। 

शुकदेवजी के बारे में हमने यह कथा सुनी है कि जब वे घर से निकलकर संन्यास लेने के लिए वन की ओर चले तो पुत्रमोह से व्याकुल उनके पिता व्यासदेवजी भी उनके पीछे चल पड़े। रास्ते में कुछ स्त्रियाँ स्नान कर रही थीं। शुकदेवजी युवा थे और उनके शरीर पर कोई वस्त्र नहीं था। इस अवस्था में भी उन्हें अपने सामने से जाते देखकर स्त्रियों को कोई संकोच नहीं हुआ। वे पूर्ववत् स्नान  करती रहीं। किन्तु, उन्होंने ज्योंही शुकदेवजी के पीछे-पीछे आते उनके पिता को देखा – जो वृद्ध और ज्ञानी थे – उन्होंने सहज लज्जा भाव से भरकर झटपट अपने-आपको वस्त्रों से ढक लिया। 

व्यासदेवजी को स्त्रियों के इस विचित्र व्यवहार से बड़ा आश्चर्य हुआ। उन्होंने जब स्त्रियों से इसका कारण पूछा तो उन स्त्रियों ने उत्तर दिया –  इसका कारण यह है कि आपकी दृष्टि में अभी भी स्त्री-पुरुष का भेद है। किन्तु, आपके युवा पुत्र की शुद्ध दृष्टि स्त्री-पुरुष में कोई भेद नहीं करती। 

शौनकजी ने फिर सूतजीसे अनुरोध किया – सूतजी, आप हमें कृपया यह भी सुनाएँ कि पांडव वंश के महान राजा परीक्षित ने अपना सारा राजपाट छोड़कर गंगा तट पर अनशन करके प्राणत्याग करने का निश्चय क्यों किया?

(मूल ग्रंथ पर आधारित)

To be continued …

श्याम  चतुर्वेदी 

सूतजी ने राजा परीक्षित की कथा आरम्भ करते हुए कहा – 

महाभारत युद्ध का अंतिम चरण था। पांडव-कौरव दोनों पक्षों के अधिकांश योद्धा वीरगति को प्राप्त हो चुके थे। द्वंद्वयुद्ध में भीम ने अपनी गदा से दुर्योधन की जांघ तोड़ डाली थी। शारीरिक एवं मानसिक आघात से टूट चुका दुर्योधन अपनी मृत्यु की प्रतीक्षा कर रहा था। 

यह सोचकर कि पांडवों की हानि देखकर दुर्योधन प्रसन्न होगा, अश्वत्थामा  ने द्रौपदी के सोते हुए पाँच पुत्रों के सिर काटकर उसे भेंट किया। किन्तु उसके इस जघन्य कृत्य से दुर्योधन थोड़ा भी प्रसन्न नहीं हुआ। उलटे, उसने अश्वत्थामा को इसके लिए बहुत धिक्कारा। 

अपने पुत्रों की ऐसी हृदयविदारक मृत्यु देखकर द्रौपदी के शोक की सीमा न रही। उसकी आँखों से बहते आँसुओं ने अर्जुन को भी विचलित कर दिया। उसने भीषण क्रोध में भरकर प्रतिज्ञा की – कल्याणि! मैं तुम्हारे आँसू तभी पोछूँगा जब मैं उस आततायी अश्वत्थामा का सिर काटकर तुम्हारे सामने लाऊँगा। [ इन छह प्रकार के अपराधियों को आततायी कहा गया है – दूसरों की संपत्ति को आग लगानेवाला, विष देनेवाला, शस्त्र का अनुचित प्रयोग करनेवाला, दूसरों का धन, खेत या स्त्री लूटनेवाला।]

यह कहकर अर्जुन रथ पर सवार होकर, जिसे भगवान श्रीकृष्ण हाँक रहे थे, अश्वत्थामा की खोज  में निकल पड़ा। अर्जुन को इस तरह अत्यंत क्रोध में वेग से आता देखकर अश्वत्थामा भी अपने प्राणों की रक्षा के लिए अपने रथ से भागने लगा। अंत में, जब उसने देखा कि उसके घोड़े थक गए हैं और प्राणरक्षा का कोई दूसरा रास्ता नहीं बचा, तो उसने अर्जुन पर ब्रह्मास्त्र का प्रयोग कर दिया। 

अश्वत्थामा द्वारा ब्रह्मास्त्र चलाते  ही सारी दिशाओं में प्रचंड प्रकाश फैलने लगा। उसके ऐसे प्रभाव को देखकर एक क्षण को अर्जुन भी दिग्भ्रमित हो गया। उसने भगवान् श्रीकृष्ण से पूछा – हे देवाधिदेव, यह भयानक तेज कैसा है और कहाँ से आ रहा है? मुझे कुछ समझ में नहीं आ रहा है। 

भगवान बोले – अश्वत्थामा ने ब्रह्मास्त्र चलाया है। उसने अपनी प्राणरक्षा के लिए इसे चला तो दिया है किन्तु वह इसे लौटाना नहीं जानता। इसे केवल ब्रह्मास्त्र द्वारा ही शांत किया जा सकता है। इसलिए तुम भी ब्रह्मास्त्र चलाओ।  

अर्जुन ने तत्क्षण अपना ब्रह्मास्त्र चलाकर अश्वत्थामा के ब्रह्मास्त्र को निरस्त कर दिया। फिर उसने अश्वत्थामा को झपटकर पकड़ लिया और उसे रस्सी से बांधकर अपने शिविर की ओर ले चला।

सारथी भगवान श्रीकृष्ण ने कहा – अर्जुन! इस आततायी ब्राह्मण को तुम इसी क्षण मार डालो। इसने सोते हुए निरपराध बच्चों को मारा है। सोते हुए, असावधान,नशे में चूर, पागल, बालक, स्त्री, मूर्ख, भयभीत, रथविहीन और शरणागत शत्रु – ऐसे व्यक्तियों को मारना घोर अधर्म है। फिर तुमने द्रौपदी से प्रतिज्ञा भी तो की है कि तुम उसे उसके पुत्रों की हत्या करनेवाले अपराधी का सिर काटकर दोगे? 

भगवान के इन तर्कपूर्ण वचनों को सुनकर भी अर्जुन कुछ विचारकर चुप रहा। वह अश्वत्थामा को लेकर अपने शिविर पहुँचा जहाँ द्रौपदी अपने मृत पुत्रों के शोक में डूबी हुई थी। अर्जुन ने अश्वत्थामा को द्रौपदी के सामने धकेल दिया। द्रौपदी ने सिर उठाकर देखा – उसके पुत्रों का हत्यारा  उसके सामने एक पशु की भांति रस्सी से बंधा हुआ सिर झुकाकर निःशब्द खड़ा है। 

अश्वत्थामा को इस अवस्था में देखकर द्रौपदी का हृदय सहसा करुणा से भर गया। उसे ऐसा लगा जैसे उसके रूप में उसके मृत पिता गुरु द्रोणाचार्य ही असहाय होकर इस समय सामने खड़े हैं। उसने अर्जुन से अधीर होकर प्रार्थना की – छोड़ दो, इसे अभी छोड़ दो! इसके पिता के आपके ऊपर बहुत उपकार हैं। उनकी कृपा से ही आपने समस्त शास्त्रों का रहस्य और धनुर्वेद का ज्ञान प्राप्त किया है। गुरु की मृत्यु के बाद अब यह पुत्र ही अपनी माता के जीवन का एकमात्र आधार रह गया है। मैं नहीं चाहती कि जिस तरह मैं अपने पुत्रों की मृत्यु पर शोक कर रही हूँ, इसकी माता भी अपने पुत्र की मृत्यु पर रोए। 

द्रौपदी के ये वचन उसकी स्वाभाविक करुणा, धर्म एवं न्याय से पूर्ण थे। वहाँ उपस्थित युधिष्ठिर,अर्जुन,नकुल और सहदेव ने, यहाँ तक कि स्वयं भगवान् श्रीकृष्ण ने द्रौपदी की सराहना की। 

किन्तु भीम उनसे सहमत नहीं हुआ। उसने क्रोधपूर्वक कहा – इस आततायी अश्वत्थामा ने सोते हुए निरपराध बालकों की बिना किसी कारण के हत्या की है। इसके इस कुकर्म से न तो इसके स्वामी दुर्योधन को कोई लाभ हुआ न ही स्वयं इसको। ऐसे व्यक्ति को जीवित रहने का कोई अधिकार नहीं है!

भगवान् ने द्रौपदी और भीम दोनों की बातें सुनी और फिर हँसते हुए-से बोले – अर्जुन! शास्त्रों में कहा गया है कि ब्राह्मण का वध नहीं किया जा सकता। साथ ही, यह भी कहा गया है कि आततायी को कभी जीवित नहीं छोड़ना चाहिए। अश्वत्थामा ब्राह्मण भी है और आततायी भी। अब तुम शास्त्रों की इन दोनों बातों का पालन करो। तुमने द्रौपदी के सामने जो प्रतिज्ञा की है, उसको भी पूरा करो। 

अर्जुन ने भगवान् का संकेत समझ लिया। शास्त्रों के अनुसार,अपराधी ब्राह्मण का सिर मूँड देना, उसका धन छीन लेना और उसे घर से भगा देना – ये सारे दंड उसके वध के समान ही हैं। ऐसा विचारकर अर्जुन ने अपनी तलवार से अश्वत्थामा का सिर मूँड दिया, उसके सिर में स्थित मणि निकाल ली और उसकी रस्सी खोलकर उसे शिविर से बाहर भगा दिया।  

(मूल ग्रंथ पर आधारित)

(अगले अंक में –   परीक्षित का जन्म )

श्याम चतुर्वेदी 

महाभारत युद्ध समाप्त हो गया था। युधिष्ठिर को उनका न्यायोचित राज्य मिल गया था। किन्तु, भगवान श्रीकृष्ण की भूमिका अभी समाप्त नहीं हुई थी। पांडवों की इच्छा एवं आवश्यकता को ध्यान में रखकर उन्होंने कुछ और  दिनों तक उनके साथ रहने का निश्चय किया। वहाँ रहकर भगवान ने युधिष्ठिर के द्वारा तीन अश्वमेध यज्ञ कराए। इन यज्ञों के माध्यम से युधिष्ठिर का दूर-दूर तक यश फैला और उनकी सत्ता भली-भांति स्थापित हो गई। 

जब ऐसा प्रतीत होने लगा कि सबकुछ लगभग सामान्य हो चला है, तब भगवान द्वारका जाने के लिए अपने रथ पर सवार हुए। सात्यिकि और उद्धव भी उनके साथ चले।

तभी उत्तरा (अभिमन्यु की पत्नी) दौड़ती हुई भगवान श्रीकृष्ण की ओर आई। वह बहुत घबराई हुई थी। वह  कातर स्वर में भगवान से प्रार्थना करने लगी – हे देवाधिदेव, मेरी रक्षा करें। एक दहकता हुआ लोहे का बाण बहुत तीव्र गति से मेरी ओर बढ़ा चला आ रहा है। मुझे अपने प्राणों की चिंता नहीं है, आप बस मेरे गर्भ की रक्षा कर लें। 

भगवान समझ गए कि अश्वत्थामा ने पांडवों के वंश को समाप्त कर देने के उद्देश्य से ब्रह्मास्त्र का प्रयोग किया है। उन्होंने तत्काल उत्तरा के गर्भ को अपनी माया के कवच से ढक दिया।

उधर उत्तरा के गर्भ में स्थित शिशु जब ब्रह्मास्त्र के प्रचंड तेज से जलने लगा, तभी उसने देखा कि एक अत्यंत तेजस्वी श्याम वर्ण का पुरुष, जिसका आकार एक अंगूठे के बराबर था, उसके सामने उपस्थित हो गया। वह पुरुष पीताम्बरधारी था और उसके चार हाथ थे। वह तीव्र गति से अपनी गदा घुमाता हुआ तब तक शिशु के चारों ओर  चक्कर लगाता रहा जबतक ब्रह्मास्त्र का प्रभाव शांत नहीं हो गया। गर्भस्थ शिशु बार-बार यही सोचता रहा कि यह पुरुष कौन है जो उसकी रक्षा कर रहा है? ब्रह्मास्त्र के निष्क्रिय हो जाने पर वह रहस्यमय पुरुष देखते ही देखते अंतर्धान हो गया। 

यही बालक बाद में परीक्षित नाम से प्रसिद्ध हुआ। वह जिसे भी देखता था, इस बात की परीक्षा करता था कि कहीं यह वही पुरुष तो नहीं है जिसे उसने गर्भस्थ रहते हुए देखा था ?

युधिष्ठिर ने जब अपने पौत्र परीक्षित के भविष्य के बारे में  ज्योतिषियों से जानना चाहा तो उन्होंने कहा – यह शिशु महान वीर, दानी, यशस्वी, धार्मिक, सहनशील, सेवक, प्रजावत्सल, भगवान् श्रीकृष्ण का परम भक्त, पृथ्वी और धर्म की रक्षा करनेवाला होगा। किन्तु कालांतर में, नियतिवश यह एक अनुचित कर्म करेगा और उसके कारण एक तपस्वी के शाप से इसे तक्षक नामक नाग डसेगा। अपने जीवन के अंतिम दिनों में  यह अपनी समस्त धन-संपत्ति एवं सांसारिक आसक्ति त्याग कर भगवान के चरणों की शरण लेगा। उस समय इसे वेदव्यासजी के पुत्र शुकदेवजी द्वारा आत्मा के यथार्थ स्वरूप के बारे में ज्ञान प्राप्त होगा। अंत में, यह अपना शरीर त्यागकर अभयपद प्राप्त करेगा। 

(मूल ग्रन्थ पर आधारित)

(अगले अंक में – भीष्म का देह-त्याग )

श्याम चतुर्वेदी 

महाभारत युद्ध का परिणाम अत्यंत भयावह था। इसमें पांडव और कौरव दोनों पक्षों को बहुत बड़ा मूल्य चुकाना पड़ा था। यद्यपि युधिष्ठिर को उनका राज्य मिल गया था, उन्हें इस बात की तनिक भी प्रसन्नता नहीं थी। उन्हें बार-बार यही लगता था कि अपने नश्वर शरीर और तुच्छ राज्य के लिए उन्होंने न जाने कितने स्वजनों और गुरुजनों की बलि चढ़ा दी थी! कितनी स्त्रियों ने अपना पति खो दिया था, कितने बच्चे अनाथ हो गए थे! उन्हें वेदव्यास आदि ऋषियों ने – स्वयं भगवान श्रीकृष्ण ने भी – इस युद्ध की अनिवार्यता एवं इसके कारण होनेवाले अवश्यम्भावी विनाश के बारे में बहुत समझाया, किन्तु उनका अपराधबोध किसी तरह कम नहीं हुआ। 

अवसादग्रस्त युधिष्ठिर तब कुरुक्षेत्र के मैदान की ओर चले जहाँ अर्जुन के बाणों से घायल भीष्म पितामह शर-शय्या पर पड़े हुए थे। युधिष्ठिर के साथ उनके सारे भाई, व्यासजी ,धौम्य ऋषि एवं स्वयं भगवान् श्रीकृष्ण भी हो लिए। भीष्म पितामह की आसन्न मृत्यु जानकर उनके दर्शन के लिए समस्त महान ऋषि-मुनि, जिनमें नारद, भरद्वाज, वृहदश्व, परशुराम, वसिष्ठ, गौतम, अत्रि, विश्वामित्र, शुकदेव, त्रित, कश्यप, आंगिरस प्रमुख थे, अपने-अपने शिष्यों के साथ वहाँ पधारे। 

शर-शैय्या पर पड़े भीष्म ऐसे प्रतीत होते थे जैसे कोई देवता स्वर्ग से पृथ्वी पर आ गिरा हो। अपनी उस कष्टपूर्ण स्थिति में भी उन्होंने सबका यथायोग्य सत्कार किया। विनय और प्रेम से भरे पांडव उनके पास ही बैठ गए। उन्हें देखकर भीष्म की आँखें नम हो गयीं। उन्होंने कहा – अहो! तुमलोग सदा धर्म के मार्ग पर चलते रहे, किन्तु बचपन से ही तुम्हें कितने कष्ट उठाने पड़े! मैं यही सोचता रहा कि जहाँ धर्मराज युधिष्ठिर, गदाधारी भीम, गांडीवधारी अर्जुन और उनके मित्र रूप में स्वयं भगवान् श्रीकृष्ण हों – वहाँ विपत्ति की भला क्या संभावना हो सकती है ! किन्तु, काल का प्रभाव आश्चर्यजनक है। जैसे बादल वायु के वश में रहते हैं, उसी तरह यह संसार कालरूप भगवान् के अधीन है। 

कुछ क्षण मौन रहकर भीष्म ने युधिष्ठिर की ओर देखा और कहा – जो कुछ भी हुआ, निश्चय ही उसके पीछे ईश्वर की कोई योजना है। इसे कोई नहीं समझ सकता। तुम इसे स्वीकार करो। अब तुम राजा हो, और, तुम्हारा यही कर्तव्य है कि तुम अपनी प्रजा का पालन करो। ये श्रीकृष्ण साक्षात् भगवान् ही हैं। इनकी माया के प्रभाव से लोग इन्हें सामान्य यदुवंशी समझते रहे। अपने भक्तों पर इनकी कृपा तो देखो – कभी ये तुम्हारे मंत्री बने, कभी दूत तो कभी सारथी! मुझ पर कृपा करके मेरे अंतिम समय में ये यहाँ उपस्थित हो गए हैं। जो भक्त भगवान् के स्वरुप का ध्यान करते हुए अपने प्राण त्यागते हैं, उन्हें सारी कामनाओं और कर्मबन्धनों से मुक्ति मिल जाती है। 

भीष्म ने फिर भगवान् श्रीकृष्ण से भक्तिपूर्वक प्रार्थना की – हे श्रीकृष्ण! आप उस क्षण तक यहीं प्रतीक्षा करें जब तक मैं अपना यह शरीर छोड़ नहीं देता। 

भीष्म के ये शब्द इस बात का संकेत दे रहे थे कि उनके प्रयाण का समय अब निकट आ चला है। 

पितामह से बिछोह के विचारमात्र से पाण्डवों का हृदय भारी हो गया। युधिष्ठिर ने तब धैर्य धारण कर सबके कल्याण के लिए उनसे धर्म के बारे में जिज्ञासाएँ कीं। भीष्म ने मनुष्य की विभिन्न अवस्थाओं में उसके कर्तव्य-अकर्तव्य, धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष की प्राप्ति के साधनों का कभी विस्तार तो कभी संक्षेप में वर्णन किया। 

इस तरह भीष्म जब धर्म पर वार्ता कर रहे थे, तभी सूर्य की दशा उत्तरायण हो गयी ( सूर्य की गति उत्तर दिशा की ओर आरम्भ हो गयी)। यह वही समय होता है जिसे योगी अपने शरीर-त्याग के लिए सबसे शुभ मानते हैं। सूर्य के उत्तरायण होते ही भीष्म मौन हो गए। उन्होंने अपने मन को संसार से समेटकर आदिपुरुष श्रीकृष्ण पर स्थिर कर दिया। 

अपने भक्त भीष्म के हृदय की इच्छा समझ कर भगवान् ने उन्हें अपने चतुर्भुज रूप में पूर्ण ऐश्वर्य के साथ दर्शन दिए। भगवान् के दर्शन मात्र से भीष्म की युद्ध के घावों से हुई  समस्त शारीरिक पीड़ा जाती रही। हृदय के शुद्ध हो जाने से उनके सांसारिक कर्मों से उत्पन्न जो अशुभ संस्कार थे, वे भी नष्ट हो गए। 

भीष्म गदगद होकर भगवान् श्रीकृष्ण की स्तुति करने लगे – हे श्रीकृष्ण! मैं अपनी मृत्यु के समय अपनी कामना रहित एवं शुद्ध बुद्धि को आपको समर्पित करता हूँ। मुझे युद्ध के समय की आपकी वह विलक्षण छवि याद आती है – बाएँ हाथ में घोड़ों की रास और दाहिने हाथ में चाबुक लेकर अर्जुन का रथ हांकते हुए युद्धभूमि की धूल से धूसरित आपका शरीर, अर्जुन के अनुरोध पर उसके रथ को दोनों सेनाओं के मध्य लाना, शत्रु पक्ष में अपने बंधुओं और गुरुजनों को देखकर उसका सहसा मोहग्रस्त हो जाना और आपके द्वारा गीता का उपदेश देकर उसके मोह का नाश करना! आपके न जाने कितने रूप हैं – आप कभी गोपियों के सखा बने, कभी अर्जुन के सारथी, कभी युधिष्ठिर के यज्ञ में प्रथमपूज्य पुरुष !

हे श्रीकृष्ण! मैं आपकी भक्तवत्सलता के बारे में क्या कहूँ! जब मैंने प्रतिज्ञा की थी कि युद्ध में मैं आपसे शस्त्र ग्रहण कराकर छोड़ूँगा तो आपने अपने भक्त की लाज रखने के लिए अपनी ( महाभारत युद्ध में शस्त्र न उठाने की ) प्रतिज्ञा तोड़ दी थी और एक टूटे हुए रथ के पहिये को शस्त्र बनाकर मुझे मारने के लिए दौड़ पड़े थे।  

जैसे एक ही सूर्य विभिन्न वस्तुओं से प्रतिबिंबित होकर अनेक दिखाई देता है, उसी तरह प्रत्येक देहधारी में विभिन्न रूपों में रहकर भी आप वस्तुतः एक ही हैं। समस्त सृष्टि में बस आप ही स्थित  हैं। मुझे आपसे भिन्न कहीं कुछ दिखाई नहीं देता। मेरी सारी भ्रांतियां नष्ट हो गयी हैं। 

इस प्रकार स्तुति कर भीष्म ने अपने आपको मन, दृष्टि और वाणी से भगवान् श्रीकृष्ण में लीन कर दिया और एक गहरी साँस लेकर सदा के लिए शांत हो गए। उन्हें अनन्त ब्रह्म में लीन हो गया जानकर वहाँ उपस्थित लोग मौन हो गए, जैसे दिन का अवसान होने पर पक्षी मौन हो जाते हैं। 

भीष्म मनुष्यों और देवताओं दोनों में पूजित थे। उनके प्रयाण के साथ ही धरती से त्याग एवं साहस का एक अध्याय समाप्त हो गया। आकाश से पुष्पों की वर्षा होने लगी। चारों ओर नगाड़े बजने लगे। युधिष्ठिर ने भीष्म का अंतिम संस्कार किया और सबके साथ हस्तिनापुर लौट आए। सारे मुनि अपने-अपने आश्रमों को चले गए। 

पाण्डवों की इच्छा को ध्यान में रखकर भगवान् श्रीकृष्ण कुछ महीनों तक उनके साथ हस्तिनापुर रहे और फिर द्वारका चले गए। उनकी योजना का एक महत्त्वपूर्ण भाग पूरा हो गया था। जैसे वायु बांसों में घर्षण करके उनसे अग्नि उत्पन्न करती है, और फिर उनकी अपनी अग्नि से ही उन्हें जला डालती है, उसी तरह भगवान् ने धरती के भारस्वरूप शक्तिशाली राजाओं को उनकी असंख्य सेनाओं के साथ आपस में लड़ाकर नष्ट कर डाला  था। 

(मूल ग्रंथ पर आधारित)

श्याम चतुर्वेदी 

(अगले अंक में – विदुर का हस्तिनापुर लौटना)

भगवान् श्रीकृष्ण के द्वारका प्रस्थान करने के कुछ महीनों के बाद विदुर अपनी तीर्थयात्रा पूरी करके हस्तिनापुर लौट आए। (विदुर ने क्यों महाभारत युद्ध में भाग नहीं लिया था और तीर्थयात्रा पर निकल गए थे, यह प्रसंग बाद में आएगा।)  उनके आगमन की सूचना पाते ही धृतराष्ट्र, गांधारी, कुंती, युयुत्सु, संजय, कृपाचार्य, एवं पांडव-परिवार के सभी नर-नारी प्रसन्नता एवं उत्साह से भरकर उनसे मिलने चल पड़े। ऐसा लगता था जैसे विदुर के आते ही उन सबके शरीर में पुनः प्राण आ गए हों। 

भोजन एवं विश्राम के बाद जब विदुर शांति से बैठे तो युधिष्ठिर ने रूंधे स्वर में उनसे कहा – तात! मैं कभी यह भूल  नहीं पाता हूँ की आपने हमें न जाने कितनी विपत्तियों से बचाया। दुर्योधन के द्वारा चाहे वह लाक्षागृह की अग्नि हो या विष देकर हमलोगों को मारने का षड्यंत्र – आपने हमें वैसे ही बचाया जैसे एक चिड़िया अपने पंखों से ढककर अपने अण्डों-बच्चों को बचाती है। 

युधिष्ठिर ने फिर पूछा – हम सभी यह जानने को उत्सुक हैं की आपने किन-किन तीर्थों  के दर्शन किये। आप तो द्वारका भी अवश्य गए होंगे। वहां हमारे प्रिय भगवान् श्रीकृष्ण और बाकी  यदुवंशियों का क्या समाचार है?

विदुर ने तब उपस्थित लोगों को अपनी तीर्थयात्रा के सारे विवरण दिए। परन्तु करुणावश यह सोचकर की इससे पांडवों को बहुत कष्ट पहुंचेगा, उन्होंने यदुवंशियों के विनाश की बात छिपा ली। वैसे भी, यह समाचार बहुत शीघ्र हस्तिनापुर पहुँचने ही वाला था। 

पांडवों की प्रसन्नता एवं धृतराष्ट्र के कल्याण के लिए विदुर ने कुछ दिनों तक उनके साथ रहने का निश्चय किया। पांडव उनकी बहुत श्रद्धा पांडव उनकी बहुत श्रद्धा करते थे। युधिष्ठिर भी धर्म एवं नियमपूर्वक राजकाज चला रहे थे। 

ऐसा प्रतीत होता था, जैसे सबकुछ सामान्य भाव से चल रहा हो। किन्तु, विदुर आनेवाले काल की गति जानते थे। एक दिन उन्होंने धृतराष्ट्र से कहा – महाराज, अब वह समय आ गया है जब हमें झटपट यहाँ से निकल जाना चाहिए। आप कब तक इस तरह मोहग्रस्त होकर यहाँ महल में पड़े रहेंगे? आपके सारे प्रियजन मारे जा चुके हैं। आपकी आयु ढल गई है। आपकी इन्द्रियां दुर्बल हो गई हैं। आपका शरीर रोगों का घर बन गया है। फिर भी आपकी जीने की इच्छा कितनी प्रबल है!

धृतराष्ट्र ने विदुर के इस कथन का आशय समझने का प्रयत्न किया। 

विदुर ने कहना जारी रखा – आपने कभी यह सोचा कि अब आप अपने ही घर में पराये हो चुके हैं? भीम द्वारा प्रतिदिन उपेक्षा से डाल दिए गए भोजन को खाकर आप एक कुत्ते-सा जीवन जी रहे हैं। जिन पांडवों को आपने कभी विष देकर, तो कभी अग्नि से जलाकर, मार डालना चाहा था, जिनकी पत्नी को आपने भरी सभा में अपमानित किया था, जिनका आपने अन्यायपूर्वक राज्य और धन छीन लिया था, आज आप उन्हीं की दया पर जीवित हैं! ऐसे निंदनीय जीवन से अपने-आपको मुक्त कीजिए। अब आगे बहुत भयंकर समय आनेवाला है। इसलिए, बिना किसी को बताए हमें यह स्थान शीघ्र ही छोड़ देना चाहिए। 

विदुर की बातों में सच्चाई थी। उन्हें सुनकर धृतराष्ट्र की प्रज्ञा के नेत्र खुल गए। 

जब गांधारी को इस बात का पता चला कि धृतराष्ट्र ने विदुर के साथ महल छोड़कर हिमालय-यात्रा की योजना बना ली है, तो उन्होंने भी उनके साथ चलने का निश्चय किया। 

अगले दिन प्रातःकाल राजा युधिष्ठिर जब संध्यावंदन के बाद गुरुजनों की चरणवंदना के लिए निकले तो महल में विदुर, धृतराष्ट्र और गांधारी को नहीं पाकर उन्हें बड़ी चिंता हुई। उन्होंने उनके सेवक संजय से पूछा, किन्तु उसे भी इसकी कोई जानकारी नहीं थी। पता नहीं, वे अभी कहाँ और किस स्थिति में होंगे, युधिष्ठिर ने सोचा।  

तभी देवर्षि नारदजी वहाँ पधारे। युधिष्ठिर की चिंता जानकर नारदजी बोले – युधिष्ठिर, किसी के लिए शोक करने का कोई लाभ नहीं है। हमारा मिलना-बिछुड़ना सब कुछ ईश्वर की इच्छा से होता है। उस पर तुम्हारा कोई अधिकार नहीं है। कौन किसकी रक्षा कर सकता है! जो बिना हाथवाले हैं, वे हाथवालों का भोजन हैं। जिनके पैर नहीं हैं, वे चार पैर वालों का भोजन हैं। निर्बल सबल का भोजन है। इस प्रकार एक जीव अपने जीवन के लिए दूसरे जीव पर निर्भर करता है। 

जहाँ तक धृतराष्ट्र एवं अन्य लोगों का प्रश्न है – नारदजी बोले – वे सभी हिमालय के दक्षिणी भाग में स्थित सप्तस्रोत के पास एक आश्रम में निवास कर रहे हैं। भगवान का निरंतर ध्यान करने से धृतराष्ट्र के समस्त दोष दूर हो जाएँगे। आज से पाँचवे दिन धृतराष्ट्र और गांधारी योग की अग्नि में भस्म हो जाएँगे। उनकी ऐसी गति देखकर विदुर को एक साथ विषाद और हर्ष दोनों की अनुभूति होगी और वे तीर्थयात्रा के लिए निकल पड़ेंगे। 

नारदजी की बातों से युधिष्ठिर को बड़ी सांत्वना मिली। नारदजी ने भी वहाँ से प्रस्थान किया। 

राजा युधिष्ठिर ने अर्जुन को भगवान श्रीकृष्ण की कुशलता जानने के लिए द्वारका भेजा था। सात महीने बीत गए। किंतु, अर्जुन जब  हस्तिनापुर नहीं लौटा तो युधिष्ठिर को चिंता होने लगी। इधर कुछ दिनों से उन्हें कई अपशकुन दिखाई देने लगे थे। उन्होंने देखा कि समय की गति उलट-पुलट हो रही है। जिस समय जो ऋतु होनी चाहिए, उस समय वह नहीं होती। प्राकृतिक आपदाओं का प्रकोप बढ़ गया है। समाज की मर्यादाएँ और मूल्य नष्ट हो रहे हैं। प्रजा में अधर्म, लोभ, कपट, द्वेष, असत्य, क्रोध, दम्भ आदि दुर्गुण बढ़ गए हैं। सर्वत्र शोक-संताप की छाया मँडरा रही है। 

युधिष्ठिर को एक अज्ञात आशंका घेरने लगी – कहीं वह समय आ तो नहीं गया जब भगवान धरती पर अपनी लीला समेट लेना चाहते हैं?

इतने में अर्जुन द्वारका से हस्तिनापुर लौट आया। अर्जुन को देखकर युधिष्ठिर को सहसा अपनी आँखों पर विश्वास नहीं हुआ। अर्जुन को यह क्या हो गया? उसका  शरीर अत्यंत दुर्बल हो गया था। उसके मुख से उसका स्वाभाविक तेज चला गया था। धरती का वह महानतम धनुर्धारी इस समय अपनी आँखों में आँसू भरकर सिर झुकाए चुपचाप खड़ा था। 

युधिष्ठिर ने व्यग्र होकर वहां उपस्थित अन्य सुहृदों के सामने ही उससे पूछा – भाई, द्वारका में सब कुशल तो है? तुम स्वयं तो कुशल हो? तुम्हारा मुख इतना श्रीहीन क्यों है? कहीं तुमसे ऐसा तो कोई कार्य नहीं हो गया जो सामाजिक या धार्मिक मर्यादा के विरुद्ध हो? … या, कहीं ऐसा तो नहीं कि तुमने अपने परममित्र भगवान श्रीकृष्ण को खो दिया हो?

अर्जुन पहले से ही विषादग्रस्त था। युधिष्ठिर के प्रश्नों ने उसका रहा-सहा धैर्य भी समाप्त कर दिया। वह बार-बार भगवान् श्रीकृष्ण का नाम लेते हुए उन्हें स्मरण करने लगा। फिर उसने अपने आँसू पोछे और अवरुद्ध कंठ  से बोलने लगा – महाराज, मेरा घनिष्ठ मित्र बनकर श्रीकृष्ण ने मुझे ठग लिया। आज तक जिसे मैं अपना पराक्रम समझता था, वह मेरा पराक्रम था ही नहीं। जितने युद्ध हमने जीते, जितनी आपदाओं से हमारी रक्षा हुई, वह सब कुछ भगवान श्रीकृष्ण का ही प्रभाव था। अब वे ही श्रीकृष्ण हम सब को  छोड़कर अपने धाम जा चुके हैं। उनके जाने के बाद मेरी सारी शक्तियाँ भी नष्ट हो गई हैं।

यह कहकर अर्जुन चुप हो गया। फिर उसने एक लम्बी साँस लेकर कहा – भगवान की रानियों को मैं अपने संरक्षण में लेकर द्वारका से चला था, किन्तु रास्ते में ही दुष्ट गोपों ने उन्हें मुझसे लूट लिया। उस समय भी मेरा वही गांडीव था, वही बाण थे, वही रथ था, वही घोड़े थे; मैं भी वही अर्जुन था जिसके सामने  कभी बड़े-बड़े राजा सिर झुकाया करते थे। किन्तु, श्रीकृष्ण के बिना ये सारे उसी तरह निष्फल हो गए जैसे भस्म में डाली हुई आहूति, कपट से भरी हुई सेवा या ऊसर भूमि में डाले हुए बीज नष्ट हो जाते हैं। 

राजन! – अर्जुन बोला – जहाँ तक द्वारकावासियों का प्रश्न है, उनमें से अधिकांश लोग गुरुजनों के शापवश आपस में ही लड़कर नष्ट हो चुके हैं। अब दैवी प्रयोजनवश कुछ ही बचे रह गए हैं। यह भगवान की लीला ही तो है – संसार के प्राणी कभी तो एक-दूसरे का पालन करते हैं, और कभी एक-दूसरे को मार भी डालते हैं। पहले तो भगवान ने शक्तिशाली यदुवंशियों द्वारा अन्य दुष्ट राजाओं का संहार कराया, फिर जब उनकी दुष्टता बढ़ने लगी तो उन्हें भी आपस में लड़ाकर पृथ्वी का भार उतार दिया। 

इस तरह भगवान की लीला का वर्णन करते-करते अर्जुन को गीता का पुनः स्मरण हो आया। भगवान के उपदेशों का ध्यान करके उसका चित्त स्थिर हो गया। 

जैसे कोई एक कांटे से दूसरा कांटा निकालता हो, और फिर उसके निकल जाने पर पहला कांटा भी फेक देता हो, उसी तरह भगवान श्रीकृष्ण ने अपने जिस मानव- शरीर से धरती का भार उतारा था, उसे भी त्याग दिया। 

अर्जुन के द्वारा भगवान श्रीकृष्ण के धरती से विदा होने का समाचार सुनकर युधिष्ठिर ने नए युग के आगमन का संकेत समझ लिया। अब इस नए काल में उनकी कोई भूमिका नहीं रह गई थी। उन्होंने अपने पौत्र परीक्षित को अपना उत्तराधिकारी नियुक्त किया और मथुरा में भगवान श्रीकृष्ण के पौत्र अनिरुद्ध के पुत्र वज्र को वहाँ का राज्य सौंप दिया। फिर तपस्वियों का वेश धारण कर, ममता और अहंकार के सारे बंधन तोड़कर, बिना किसी की प्रतीक्षा किए, एक बहरे व्यक्ति की तरह बिना किसी की बात सुने भगवान श्रीकृष्ण का स्मरण करते हुए उत्तर दिशा की ओर चल पड़े। 

युधिष्ठिर को इस तरह जाते देखकर उनके चारों भाई भी उनके साथ हो लिए। भगवान श्रीकृष्ण के निरंतर स्मरण से पांचों पांडवों, माता कुंती और द्रौपदी – सबकी बुद्धि निर्मल हो गई। 

उधर तीर्थयात्रा पर निकले विदुर ने भी प्रभास क्षेत्र में अपने शरीर को त्याग दिया। 

(मूल ग्रंथ पर आधारित)

श्याम चतुर्वेदी 

(अगले अंक में – भक्ति की दुर्दशा एवं नारदजी का आगमन)

राज्याभिषेक के बाद राजा परीक्षित धर्मपूर्वक राज्य का शासन करने लगे। उन्होंने उत्तर की पुत्री इरावती से विवाह किया जिससे उनके जनमेजय सहित चार पुत्र हुए। उन्होंने तीन अश्वमेध यज्ञ किए और दिग्विजय के लिए निकल पड़े। वे जहाँ भी जाते, वहीं लोगों के मुख से अपने पूर्वजों और उन पर भगवान् श्रीकृष्ण की अगाध कृपा का बखान सुनते। इससे भगवान् श्रीकृष्ण के चरणों में उनकी भक्ति दिन पर दिन बढ़ती चली गई।  

एक दिन राजा परीक्षित ने एक अत्यंत करुण दृश्य देखा। उनके शिविर से थोड़ी दूरी पर एक बैल खड़ा था। उसका एक ही पैर था। उसके पास ही एक गाय भी खड़ी थी जो बहुत दुर्बल दिखाई देती थी। उन दोनों पशुओं को एक क्रूर पुरुष निर्दयतापूर्वक डंडे और लातों से बराबर मार रहा था। दोनों पशु भय से बुरी तरह कांप रहे थे और असहाय भाव से उसकी मार झेल रहे थे। 

यह देखकर राजा परीक्षित को बहुत क्रोध आया। उन्होंने उस निर्दयी पुरुष को ललकार कर पूछा – तू कौन है? तुमने वस्त्र तो राजाओं की तरह पहन रखे हैं किन्तु तेरे कर्म राजाओं-जैसे नहीं हैं। तू बलवान होकर भी इन दुर्बल प्राणियों को क्यों सता रहा है? मेरे राज्य में निरपराधों पर ऐसा अत्याचार करनेवाला तू निश्चय ही वध के योग्य है। 

राजा ने फिर बैल से पूछा – आप तो चार पैर वाले जीव हैं। आपके बाकी तीन पैर किसने काट डाले? मुझे आप सामान्य बैल नहीं प्रतीत होते। कहीं बैल के रूप में आप कोई देवता तो नहीं हैं? आपकी यह दुरवस्था कैसे हो गई? 

बैल ने उत्तर दिया – राजन! आपने पांडवों के वंशज के अनुरूप ही वचन कहे हैं। किन्तु मुझे समझ में नहीं आता कि मैं अपने दुःख  का क्या कारण बताऊँ! शास्त्रों में भी इस बात पर मतभेद है कि दुःख का वास्तविक कारण क्या होता है। कोई कहता है कि अपने दुखों के लिए हम स्वयं ही उत्तरदायी हैं। कुछ शास्त्र दैवी शक्तियों को इसके लिए दायी ठहराते हैं। कुछ तो यह भी मानते हैं कि दुःख का कारण न तो तर्क द्वारा बताया जा सकता है न ही वाणी द्वारा। इसलिए, हे राजन, आप स्वयं निश्चित करें कि इनमें से कौन-सा मत सही है। 

परीक्षित ने कहा – मैं समझ गया। वृषभ के रूप में आप साक्षात् धर्म ही हैं।भला इतनी गंभीर बातें और कौन कह सकता है! सत्ययुग में आपके चार पैर थे – तप, शुचिता, दया और सत्य। समय के साथ अधर्म के अंश गर्व, आसक्ति और मद के प्रभाव से आपके तीन पैर नहीं रहे। अब केवल सत्य ही बचा रह गया है जिसके बल पर आप किसी तरह खड़े हैं। यह क्रूर पुरुष अवश्य ही कलियुग है जो आपके इस पैर को भी नष्ट कर देना चाहता है। और, यह गोमाता साक्षात् पृथ्वी हैं जो भगवान् श्रीकृष्ण के जाने के बाद कलियुग के अत्याचार झेलने को विवश हो गई हैं। आपलोगों को सतानेवाले इस  कलियुग को मैं अब जीवित नहीं छोड़ूँगा। 

ऐसा कहकर राजा परीक्षित ने अपनी तलवार निकाल ली और कलियुग को मारने के लिए आगे बढ़े। अपनी मृत्यु को सामने देखकर भयभीत कलियुग ने तुरंत अपने सारे राजसी परिधान और राजचिह्न  उतार फेंके और अपने प्राणों की भिक्षा माँगता हुआ परीक्षित के चरणों में गिर पड़ा। परीक्षित ने उसे ऐसा करते देखकर हँसते हुए-से कहा – तेरे कर्म बहुत नीच हैं। किन्तु, इस समय तू मेरी शरण में आ गया है, इसलिए मैं तुझे नहीं मारूँगा। साथ ही, यह भी स्पष्ट है कि तू मेरे  राज्य में नहीं रह सकता। मेरा राज्य केवल धर्म और सत्य का निवासस्थान है। 

कलियुग ने राजा से प्रार्थना की – सार्वभौम! मैं फिर कहाँ जाऊँ? मैं तो जहाँ भी जाने का विचार करता हूँ, वहीं आपको धनुष-बाण चढ़ाए अपने सामने देखता हूँ। अब आप ही बताएँ कि मैं कहाँ रहूँ? 

कलियुग की  प्रार्थना सुनकर परीक्षित ने कुछ विचारा और उसे रहने के लिए चार स्थान दिए – द्युत (जुआ), मद्यपान,अवैध स्त्रीसंग और हिंसा। ये  क्रियाऍं क्रमशः असत्य, मद, आसक्ति और निर्दयता से उत्पन्न होती हैं। 

कलियुग को इतने से संतोष नहीं हुआ। उसने राजा से अपने रहने के लिए कुछ और स्थान  माँगे। परीक्षित ने तब उसे एक और स्थान दिया – अधर्म से उपार्जित धन भी तुम्हारा निवासस्थान होगा। 

इस प्रकार कलियुग के ये पाँच स्थान हो गए। आत्मकल्याण चाहनेवाले पुरुषों को, विशेषकर धर्मपरायण शासकों, प्रजागण के नेताओं और धर्मोपदेशक गुरुओं को इन पाँच स्थानों से सदा दूर रहना चाहिए। 

इसके बाद राजा परीक्षित ने धर्म के बाकी तीनों टूटे हुए  पैरों – तप, पवित्रता और दया – को पुनः जोड़ दिया। उन्होंने पृथ्वी को भी अभयदान दिया।

जबतक राजा परीक्षित का शासन रहा, कलियुग सिर नहीं उठा सका। कलियुग का यह स्वभाव है कि वह धीर और धर्मपरायण पुरुषों से भयभीत रहता है, किन्तु, प्रमादी पुरुषों पर भेड़िये की तरह टूट पड़ता है। 

(मूल ग्रन्थ पर आधारित)

श्याम चतुर्वेदी 

( अगले अंक में – राजा परीक्षित को ऋषिकुमार द्वारा शाप)  

एक बार राजा परीक्षित शिकार खेलने के लिए वन में गए। शिकार खेलने में उन्हें समय की सुध न रही। जब उन्हें जोरों की  प्यास सताने लगी तो वे जल की खोज में भटकते हुए ऋषि शमीक के आश्रम पहुँच गए।

राजा ने ऋषि को प्रणाम कर उनसे जल के लिए अनुरोध किया। उस समय ऋषि आँखें बंद कर गहरे ध्यान में बैठे हुए थे। उन्हें राजा की उपस्थिति का बिलकुल पता ही नहीं चला। किन्तु, भूख-प्यास से व्याकुल राजा ने ऋषि के इस आचरण से स्वयं को बहुत अपमानित अनुभव किया। 

संभवतः यह ऋषि अहंकारवश मेरा स्वागत नहीं करना चाहता है, और इसने जान-बूझकर अपनी ऑंखें बंद कर समाधि का ढोंग रचा है – राजा ने सोचा। भूख-प्यास ने उनका विवेक हर-सा लिया था। क्रोध और अपमान से तिलमिलाए राजा ने तब पास ही पड़े एक मृत साँप को अपने धनुष की नोक से उठाया और उसे ऋषि के गले में डालकर अपनी राजधानी चले गए। 

जब राजा परीक्षित का ऋषि शमीक के आश्रम में आगमन हुआ, उस समय ऋषि-पुत्र श्रृंगी अन्य ऋषिकुमारों के साथ खेलने में व्यस्त था। उसे जब राजा के दुर्व्यवहार की सूचना मिली तो उसके क्रोध और दुःख का ठिकाना नहीं रहा। अत्यंत क्षोभ के साथ उसने कहा – इन राजाओं का साहस  तो देखो कि वे पूज्य ऋषियों का ऐसा अपमान करते हैं! अब मेरा तपोबल देखो – मैं अभी इस उद्धत राजा को उसके कर्मों का दंड देता हूँ। 

यह कहकर उस ऋषिकुमार ने जल से आचमन किया और राजा को यह शाप दिया – इस कुलांगार परीक्षित ने मेरे पिता के गले में मृत साँप डालकर उनका अपमान किया है। उसके इस जघन्य कर्म के लिए मैं यह शाप देता हूँ कि आज से ठीक सातवें दिन तक्षक साँप द्वारा डस लिए जाने से उसकी मृत्यु हो जाएगी!

जब ऋषि अपनी ध्यानावस्था से बाहर आए और उन्हें इस शाप का पता चला तो उन्हें बहुत दुःख हुआ। उन्होंने अपने पुत्र की नादानी पर खेद प्रकट करते  हुए कहा – मूढ़ बालक! तुमने यह क्या किया? तुमने राजा परीक्षित- जैसे धर्मपरायण और प्रजावत्सल व्यक्ति को उनकी एक छोटी-सी  भूल के लिए इतना बड़ा दंड दे डाला? तुम्हें पता नहीं कि ऐसे राजा के पृथ्वी पर न रहने से सर्वत्र अराजकता, अपराध, अत्याचार, अनाचार की बाढ़ आ जाएगी? राजर्षि परीक्षित भगवान के बड़े भक्त हैं। वे भूख-प्यास से व्याकुल होकर हमारे आश्रम आए थे। वे हमारे अतिथि थे। तुम्हें उनको शाप नहीं देना चाहिए था। भगवान के भक्तों में प्रतिशोध की क्षमता होते हुए भी उनमें क्षमाशीलता ही शोभा पाती है। भगवान तुम्हारी इस नासमझी को क्षमा करें!

उधर क्रोध का क्षणिक आवेश समाप्त होने पर राजा परीक्षित को अपनी भूल के लिए बड़ी ग्लानि हुई। वे आश्चर्य और दुःख के साथ बार-बार यही सोचने लगे  – मैंने उस निरपराध ऋषि के प्रति कैसा नीच व्यवहार किया! अब तो मेरा यही प्रायश्चित है कि मुझे इसके लिए कठोर से कठोर दंड मिले। मेरा सबकुछ नष्ट हो जाए ताकि मैं फिर कभी ऐसा दुराचरण करने का साहस न कर सकूँ। 

जिस समय राजा ये बातें सोच रहे थे, उसी समय उन्हें ऋषि-पुत्र द्वारा दिए गए शाप की सूचना मिली। वे तो जैसे इसकी ही प्रतीक्षा कर रहे थे। संसार के प्रति उनकी आसक्ति पहले भी कभी अधिक नहीं रही थी। अब इस शाप ने उनकी रही-सही आसक्ति को भी नष्ट कर दिया। उन्होंने बिना कोई समय गँवाए अपने पुत्र जनमेजय को राजकाज का भार सौंपा और भगवान श्रीकृष्ण को अपने हृदय में रखकर आमरण अनशन का व्रत लेकर गंगा तट पर बैठ गए। 

(मूल ग्रन्थ पर आधारित)

श्याम चतुर्वेदी 

(अगले अंक में – परीक्षित-शुकदेव संवाद)

(पिछले अंक में आपने पढ़ा – राजा परीक्षित को ऋषि शमीक के प्रति अकारण दुर्व्यवहार के कारण ऋषिकुमार श्रृंगी ने शाप दिया कि उस घटना के ठीक सातवें दिन तक्षक नामक साँप के डस लेने से उनकी मृत्यु हो जाएगी। अपराध-बोध से ग्रस्त राजा ने इस शाप की सूचना पाते ही अपना राजपाट अपने पुत्र को सौंपा और आमरण अनशन का व्रत लेकर आत्मशुद्धि के लिए गंगा तट पर बैठ गए।)

राजा परीक्षित के आमरण अनशन का समाचार मिलते ही विभिन्न दिशाओं से ऋषि-मुनि अपने-अपने शिष्यों के साथ गंगा तट पर पधारने लगे। इनमें अत्रि, वसिष्ठ, च्यवन, शरद्वान, अरिष्टनेमि, भृगु, अंगिरा, पराशर, विश्वामित्र, परशुराम, भारद्वाज, गौतम, उतथ्य, इन्द्रप्रमद, इध्मवाह, मेधातिथि, देवल, अर्ष्टिषेण, और्व, कवष, पिप्पलाद, मैत्रेय, अगस्त्य, नारद, व्यास आदि सारे महान ऋषि सम्मिलित थे। संतजनों के आगमन से वह स्थल एक तीर्थस्थल बन गया। 

राजा ने आदरसहित सारे ऋषियों का सत्कार किया और उनसे दो जिज्ञासाएँ की –  प्रथम, सामान्य परिस्थितियों में जीव के क्या कर्तव्य हैं? द्वितीय, जिस जीव की मृत्यु उसके निकट आ गई हो, उसके क्या कर्तव्य हैं?

ऋषियों ने राजा परीक्षित के आमरण अनशन के कठिन व्रत का सम्मान करते हुए कहा- राजर्षि! आपकी धीरता और वैराग्य की यह भावना भगवान श्रीकृष्ण के भक्त के अनुरूप है। आपके जीवन की अंतिम वेला में हम सभी तबतक यहीं आपके साथ रहेंगे जबतक आप अपने समस्त शोक से मुक्त होकर अपने नश्वर शरीर को छोड़कर परमधाम को प्राप्त नहीं हो जाते। 

इसी बीच वहाँ शुकदेवजी पधारे। उनकी आयु सोलह वर्ष की थी। उनका शरीर श्याम वर्ण का था। उनके निर्दोष शरीर पर न कोई वस्त्र था न ही उनके वर्ण अथवा आश्रम का संकेत देनेवाला कोई बाह्य चिह्न। स्त्रियों एवं बालकों का एक दल कौतूहलवश उनके साथ-साथ चल रहा था। 

शुकदेवजी के व्यक्तित्व के लक्षणों को देखकर सूक्ष्मदर्शी ऋषियों को यह पहचानते देर न लगी कि वे परम सिद्ध शुकदेवजी हैं। समस्त ऋषिगण उनके सम्मान में अपने आसन छोड़कर उठ खड़े हुए और आदरपूर्वक उन्हें सर्वोच्च आसन पर बिठाया। चारों तरफ ऋषियों के बीच बैठे हुए शुकदेवजी वैसे ही शोभायमान हुए जैसे तारों से घिरा चन्द्रमा। शुकदेवजी की ऐसी महिमा देखकर स्त्रियाँ और बालक वहीं से लौट गए।

राजा परीक्षित ने शुकदेवजी को प्रणाम किया और निवेदन किया – भगवन्! यह भगवान श्रीकृष्ण की ही कृपा है कि मेरी मृत्यु के समय आप-जैसे दुर्लभ, एकांतवासी, योगियों के परम गुरु, परम सिद्ध पुरुष के दर्शन हुए। मुझे कृपया यह बताएँ कि मनुष्य मात्र के क्या कर्तव्य हैं? मनुष्य क्या श्रवण करे? किसका स्मरण करे? किसे जपे? किसका भजन करे? और, साथ ही, वह क्या-क्या न करे? आप मुझे कृपया यह भी बताएँ कि उस मनुष्य को क्या करना चाहिए जिसकी मृत्यु उसके सामने खड़ी हो।

शुकदेवजी बोले – हे राजन! आपका यह प्रश्न बहुत उत्तम है, क्योंकि इसमें लोकहित की भावना निहित है। आत्मज्ञान से रहित साधारण मनुष्य अपनी सारी आयु निद्रा, भोग, धनार्जन, अपने कुटुम्बियों के भरण-पोषण, आदि में नष्ट कर देता है। इस नश्वर जीवन में उसकी आसक्ति इतनी हो जाती है कि उसे अपनी अवश्यम्भावी मृत्यु का विचार तक नहीं आता। इसलिए,जो अभयपद को पाना चाहता है, उसे भगवान श्रीकृष्ण की लीलाओं का ही श्रवण, कीर्तन एवं स्मरण करना चाहिए। हमारा मार्ग चाहे जो भी हो – ज्ञान, भक्ति या स्वधर्म के प्रति निष्ठा – हमें अपना जीवन ऐसा बना लेना चाहिए कि मृत्यु के समय भगवान की स्मृति बनी रहे। 

हे परीक्षित! अभी आपके जीवन के सात दिन शेष हैं। 

मृत्यु का समय आ जाने पर मनुष्य को घबराना नहीं चाहिए। ऐसे समय में वह अपने शरीर और इससे सम्बन्धित सभी लोगों के प्रति अपनी आसक्ति के बंधन वैराग्य के शस्त्र से काट डाले। फिर अपने मन और इन्द्रियों को सारे लौकिक विषयों से समेटकर स्थिरचित्त होकर केवल भगवान् का ध्यान करे। शुद्ध मन का भगवान में तल्लीन हो जाना ही परमपद होता है जिसे पाकर मन में केवल आनन्द रह जाता है। 

हे राजन! मैं आपको श्रीमद्भागवत महापुराण सुनाऊँगा। इसे सुनने से आप अपनी समस्त इन्द्रियों और मन को सांसारिक विषयों से हटाकर केवल भगवान का ध्यान करने में सफल होंगे। इस ग्रन्थ की शिक्षा मुझे मेरे पिता वेदव्यासजी ने द्वापर युग के अंत में दी थी। वैसे तो मेरी निष्ठा भगवान के निर्गुण रूप में है, किन्तु भगवान श्रीकृष्ण की मधुर लीलाओं के आकर्षण से मैं भी नहीं बच पाया!

हे परीक्षित! इस संसार के पदार्थ निस्सार हैं। उनका हम चाहे जितना भी संग्रह कर लें, हम दुःख से बच नहीं सकते। इसलिए, बुद्धिमान मनुष्य इन पदार्थों के लिए अनावश्यक श्रम न करे। यदि सोने के लिए भूमि उपलब्ध हो तो हम पलंग की चिंता क्यों करें? अपनी भुजाओं के रहते तकिए की क्या आवश्यकता है? जब अंजलि से ही काम चल जाए तो बर्तनों का संग्रह क्यों किया जाए? यदि वृक्षों की छाल से लज्जा ढक जाती है तो हम मूल्यवान वस्त्र क्यों पहनें? क्या वृक्षों ने फल देना बंद कर दिया है कि हमें भूखा रहना पड़े? नदियाँ क्या सूख गई हैं कि हमारी प्यास न बुझे? क्या पहाड़ों की गुफाएँ बंद कर दी गई हैं कि हमें घर बनाने की आवश्यकता पड़े? सारी बातें छोड़ो, क्या भगवान भी अब अपने शरणागतों की रक्षा नहीं करते?… जब जीवन जीने के इतने साधन उपलब्ध हैं, तो भला कोई बुद्धिमान मनुष्य क्यों धन के मद में चूर धनी लोगों के सामने हाथ पसारे?

हे राजन! जब मनुष्य इस सत्य को समझ लेता है तो वह सांसारिक पदार्थों से विरक्त होकर अपने चित्त में स्थित परम सत्य अनन्त भगवान का ही भजन करने लगता है। जब योगी इस लोक को छोड़ना चाहता है तो ‘नेति’ ‘नेति’ (‘यह नहीं’, ‘यह नहीं’) का बोध कर परमात्मा से इतर समस्त पदार्थों एवं वृत्तियों का त्याग करके केवल परमात्मा का ही ध्यान करता है। इस तल्लीनता की अवस्था में उसके लिए तब कोई कर्तव्य नहीं रह जाता है। वह त्रिगुणातीत हो जाता है – उसके लिए न तो सत्त्वगुण रह जाता है न ही रजोगुण अथवा तमोगुण। 

संसार-चक्र में पड़े हुए मनुष्य के लिए एक ही कल्याणकारी मार्ग है – भगवान श्रीकृष्ण में भक्ति। ब्रह्मा ने सारे वेदों का तीन बार अनुशीलन करके यह निष्कर्ष निकाला कि जिससे भगवान श्रीकृष्ण के प्रति अनन्य प्रेम जगता हो, वही सर्वोच्च धर्म है। समस्त चर-अचर प्राणियों में उनके आत्मा-रूप में भगवान श्रीकृष्ण ही विद्यमान हैं। अतः, मनुष्य को चाहिए कि सब समय और सारी परिस्थितियों में भगवान श्रीकृष्ण की ही लीलाओं का श्रवण, कीर्तन और स्मरण करे। 

हे राजन! मैंने आपके दोनों प्रश्नों का उत्तर दे दिया।

जिसे यश, सौंदर्य, धन, शक्ति, सुख, संतान, विद्या, स्वर्ग, राज्य, आयु, भोग की इच्छा हो,वह विभिन्न देवी-देवताओं की उपासना करे। किन्तु, बुद्धिमान मनुष्य को भगवद्भक्ति में ही लीन रहना चाहिए और भगवद्भक्तों की संगति में हरिकथा का सुख लेना चाहिए। 

(मूल ग्रन्थ पर आधारित)

श्याम चतुर्वेदी 

(अगले अंक में – शुकदेवजी द्वारा सृष्टि एवं भगवान के विभिन्न अवतारों का वर्णन)

परीक्षित ने शुकदेवजी से जिज्ञासा की – हे पवित्र और सर्वज्ञ मुनिवर! भगवान इस सृष्टि की रचना, रक्षा और संहार कैसे करते हैं?

शुकदेवजी ने उत्तर दिया  – हे राजन! एक बार नारदजी ने अपने पिता ब्रह्माजी से यही प्रश्न किया था। ब्रह्माजी ने तब यह उत्तर दिया था – पुत्र नारद! ऊपर से यही प्रतीत होता है कि मैं इस सृष्टि की रचना करता हूँ। किंतु, मैं भी स्वतंत्र नहीं हूँ। मैं उन नारायण के अधीन हूँ जो सबके स्वामी हैं। उनका न तो आदि है न ही अंत। वे शाश्वत, शांत, अभय और परम ज्ञान स्वरूप हैं। वे त्रिगुणातीत और मायातीत हैं। उन्होंने केवल संसार की सृष्टि, रक्षा और संहार के लिए क्रमशः रजोगुण, सतोगुण और तमोगुण को स्वीकार किया है। उन्हीं की प्रेरणा से मैं जगत की सृष्टि करता हूँ। वे स्वयं विष्णु रूप में इसका पालन करते हैं। और, उन्हीं के अधीन  होकर शिवजी इसका विनाश करते हैं।

श्याम चतुर्वेदी 

राजा परीक्षित ने शुकदेवजी से अनुरोध किया – प्रभो! आप कृपया हमें महात्मा विदुरजी का चरित्र सुनायें। उन्होंने क्यों अपना सुख-सुविधापूर्ण घर-बार छोड़ दिया और तीर्थयात्रा पर निकल गये? तीर्थयात्रा के समय उनकी भेंट किन-किन महात्माओं से हुई और उनमें क्या बातें हुईं?

शुकदेवजी बोले – हे राजन! धृतराष्ट्र पुत्र-प्रेम में अंधा था। वह नीति-अनीति में भेद करने की क्षमता खो चुका था। उसने पांडवों को लाक्षागृह में आग लगाकर मार देना चाहा। उसने भरी सभा में उनकी पत्नी द्रौपदी को अपमानित करने से भी अपने पुत्रों को नहीं रोका। उसने अन्याय से पांडवों का सारा राज्य द्यूत में जीतकर उन्हें वनवास दे दिया।

पाण्डु पुत्रों ने धृतराष्ट्र का सारा अन्याय धैर्य के साथ सहा। वन से लौटने के  बाद जब उन्होंने धृतराष्ट्र से अपना न्यायोचित राज्य माँगा तो धृतराष्ट्र ने उन्हें वह नहीं दिया। यहाँ तक कि जब भगवान श्रीकृष्ण पांडवों का दूत बनकर शांति प्रस्ताव लेकर धृतराष्ट्र की राजसभा में गए, तब भी उसकी बुद्धि नहीं खुली। भगवान का प्रस्ताव सभी के हित में था, किन्तु धृतराष्ट्र ने उसका सम्मान नहीं किया। वह करता भी कैसे, उसके सारे पुण्य तो बहुत पहले क्षीण हो गए थे!

धृतराष्ट्र मूर्ख न था। क्योंकि, अपनी मूर्खताओं के संभावित दुष्परिणाम के प्रति वह सजग था। कौरवों के आसन्न नाश की आशंका ने उसे अशांत कर दिया। उसने सलाह के लिए विदुरजी को अपनी सभा में बुलाया। वहाँ कर्ण और शकुनि के साथ दुर्योधन भी पहले से उपस्थित था।

धृतराष्ट्र के द्वारा यह पूछे जाने पर कि तत्कालीन परिस्थिति में उसे क्या करना चाहिए, विदुरजी ने स्पष्ट स्वर में यह उत्तर दिया – महाराज! अबतक आपके सारे असहनीय अपराधों को अजातशत्रु महात्मा युधिष्ठिर ने धैर्यपूर्वक सहा है। अब आप उन्हें उनका हिस्सा दे दीजिए।  

विदुरजी ने आगे कहा – आप थोड़ा विचार करें, इस समय सारी परिस्थितियाँ आपके प्रतिकूल हैं। आप जिस भीम से इतना डरते हैं, वह भीम अपने भाइयों सहित भीषण प्रतिशोध की भावना से नाग की तरह फुफकार रहा है। पांडवों को स्वयं भगवान श्रीकृष्ण का संरक्षण प्राप्त है। इस पृथ्वी के बड़े-बड़े राजाओं का बल एवं मनीषियों और देवताओं का आशीर्वाद भी पांडवों के ही साथ है।

विदुरजी ने फिर दुर्योधन की ओर संकेत करके कहा – आपके पुत्र दुर्योधन के रूप में साक्षात आपका दुर्भाग्य ही आपके घर में आ बैठा है। वह अपनी मूर्खतावश भगवान श्रीकृष्ण से द्वेष करता है! और, सदैव उसका समर्थन करने के कारण आप भी श्रीहीन हो गए हैं। यदि आप अपने कुल का कल्याण चाहते हैं तो अपने इस दुष्ट पुत्र का तुरन्त त्याग कर दीजिए।

विदुरजी के ये वचन सत्य और नीतिसंगत थे। किन्तु, वे कठोर भी थे। उन्हें सुनकर दुर्योधन को अत्यन्त क्रोध आया। उसने चिल्लाते हुए कहा – इस दासी-पुत्र को किसने यहाँ बुलाया? इसकी नीचता देखो- यह हमारे टुकड़ों पर पलता है और हमारे शत्रुओं का पक्ष लेता है! इसके अपराध के लिए इसे हम मारेंगे तो नहीं, किन्तु इसे इसी क्षण हमारे नगर से बाहर निकाल दिया जाए!

दुर्योधन के अशिष्ट वचनों से विदुरजी तनिक भी विचलित नहीं हुए। उन्होंने धृतराष्ट्र की ओर देखा। धृतराष्ट्र के मुँह से जब दुर्योधन के विरोध में एक शब्द तक नहीं निकला तो वे समझ गए कि अब वहाँ उनकी कोई प्रासंगिकता नहीं रह गई। 

भगवान की माया की चाल को कोई नहीं समझ सकता – विदुरजी ने अपना सिर हिलाते हुए सोचा।

फिर उन्होंने बिना कोई विलंब किए अपना धनुष राजद्वार पर रख दिया और हस्तिनापुर से निकल गए।

(मूल ग्रंथ पर आधारित)

श्याम चतुर्वेदी 

(गतांक से आगे)

हस्तिनापुर से निकल कर विदुर तीर्थयात्रा पर चल पड़े। उन्होंने अवधूत-वेश धारण कर लिया जिससे उन्हें कोई पहचान नहीं सके। उनकी दिनचर्या बहुत संयमित थी। उनका भोजन सदा साधारण और पवित्र होता था। वे भूमि पर सोते थे। भगवान को जिससे प्रसन्नता मिले, वे उन समस्त आवश्यक व्रतों का पालन किया करते थे।

विभिन्न तीर्थों में विचरण करते हुए जब वे प्रभास-क्षेत्र पहुँचे तो वहाँ उन्हें महाभारत युद्ध के बारे में सूचना मिली। युद्ध समाप्त हो गया था और अपने पीछे इतिहास में कभी न मिटने वाली भयानक विनाश की लकीर खींच गया था। कौरव मारे जा चुके थे। राज्य की बागडोर अब युधिष्ठिर के हाथों में थी।

वहाँ से चल कर विदुर यमुना-तट पर पहुँचे जहाँ उनकी भेंट उद्धव से हुई। उद्धव अपने शैशव काल से ही भगवान श्रीकृष्ण के परम भक्त थे। दोनों भक्त बहुत प्रेम से मिले। विदुर ने अधीरतापूर्वक भगवान श्रीकृष्ण, उनके स्वजनों, उनकी प्रजा की कुशलता के बारे में पूछा। साथ ही, उन्होंने पांडवों का समाचार भी सुनना चाहा। 

विदुर के प्रश्नों की झड़ी से उद्धव को अपने आराध्य की तीव्र स्मृति हो आई। वे भावविह्वल होकर कर कहीं खो गए। धीरे-धीरे वे चेतन जगत में लौटे और बोले  – भगवान-रूपी सूर्य के नहीं रहने पर हमारे घरों को काल-रूपी अजगर ने खा लिया है। अब किसकी कुशलता सुनाई जाए!

समस्त सृष्टि के स्वामी भगवान ने जब अपने शांत-रूप महात्माओं को अपने ही घोर-रूप असुरों से सताया जाता देखा तो करुणावश वे अजन्मा होते हुए भी धरती पर वैसे ही प्रकट हुए जैसे लकड़ी से आग प्रकट होती है। फिर उन्होंने पृथ्वी को अन्यायी एवं अत्याचारी राजाओं के शासन के भार से मुक्त किया।

अपनी शक्ति के अभिमान में चूर यादवों ने एक बार द्वारका पुरी में कुछ मुनियों को अकारण चिढ़ा दिया। मुनियों को यह ज्ञान था कि समस्त अभिमानी तत्त्वों का नाश होना भगवान की योजना का एक अंग है। इसलिए, उन्होंने यादवों को शाप दे दिया कि उनका सामूहिक विनाश हो जाए ।

शाप के कुछ महीनों के बाद यादव प्रभास-क्षेत्र गए। वहाँ उन्होंने पितर-पूजा की, दान-दक्षिणा दी। भोजन करने के बाद उन्होंने वारुणि नामक मदिरा पी। मदिरा के प्रभाव से उनमें किसी छोटे विवाद से आपस में ही मार-काट शुरू हो गई। संध्या काल होते-होते उन सबका नाश हो गया।

भगवान ने इस घटना से पहले मुझे आदेश दिया था कि मै बदरिकाश्रम चला जाऊँ। किन्तु, मैं भगवान से वियोग की कल्पना भी नहीं कर सकता था। इसलिए मैं भी उनके पीछे पीछे प्रभास-क्षेत्र चला आया। वहाँ मैंने भगवान को सरस्वती के तट पर एक छोटे-से पीपल वृक्ष के नीचे अपने चतुर्भुज रूप में अकेला बैठा देखा। 

उसी समय वहाँ व्यासजी के प्रिय मित्र परम भागवत सिद्ध मैत्रेय पधारे। उनकी उपस्थिति में ही भगवान ने मुझसे यह कहा – उद्धव! तुम पिछले जन्म में वसु थे।  मुझे पाने की तुम्हारी तीव्र इच्छा और भक्ति साधना के कारण तुमने मेरा यह दिव्य रूप देखा। मेरा अब धरती को छोड़ने का समय आ गया है। उसके पहले मैं तुम्हें अपने वास्तविक स्वरूप के बारे में ज्ञान दूँगा जिसे विवेकी जन भागवत कहते हैं।  

विदुरजी, भगवान से ज्ञान प्राप्त करने के बाद मैं अब बदरिकाश्रम जा रहा हूँ जहाँ नारायण और नर लोकहित के लिए कठिन तप में लीन हैं। 

भगवान ने मेरे सामने ही मैत्रेय को यह आदेश दिया था कि वे आपको उस परम ज्ञान का उपदेश करें। अतः आप उनके दर्शन करें।

भगवान ने परम धाम जाने के पहले मुझे भी स्मरण किया था, यह जानकर  भक्ति और कृतज्ञता से विदुर का हृदय भर आया।  

यमुना तट पर इन दोनों भक्तों ने ज्ञान-चर्चा करते हुए सारी रात्रि एक क्षण के समान बिता दी। प्रातःकाल  होते ही उद्धव वहाँ से चल दिए।

यह सारा प्रसंग सुनने के बाद राजा परीक्षित ने  शुकदेवजी से पूछा – जब भगवान के सारे स्वजन नष्ट हो गए और स्वयं भगवान ने भी अपना भौतिक रूप त्याग दिया तो फिर उद्धवजी ही कैसे बच गए?

शुकदेवजी ने कहा – भगवान ने पृथ्वी छोड़ने के पहले यह विचार किया कि उद्धवजी ऐसे भक्त और ज्ञानी हैं जिन्होंने अपने-आपको जीत लिया है। विषय-वासनाओं का उन पर कभी कोई प्रभाव नहीं पड़ा। भगवान  के अंतर्धान होने पर वे ही उनके ज्ञान की शिक्षा देने में समर्थ हैं। अतः भगवान की इसी इच्छा से उद्धवजी बचे रहे। 

(मूल ग्रंथ पर आधारित)

श्याम चतुर्वेदी 

उद्धव के जाने के बाद विदुर भी यमुना-तट से चलकर कुछ दिनों में गंगा के किनारे (हरिद्वार) पहुँचे जहाँ उनकी मैत्रेय से भेंट हुई। 

वार्तालाप के दौरान विदुर ने कई विषयों पर चर्चा की। उन्होंने जब जगत की उत्पत्ति के बारे में जिज्ञासा की तो मैत्रेय ने कहा – सृष्टि के पहले संपूर्ण जगत जल में डूबा हुआ था और उसमें समस्त जीवों को उनके सूक्ष्म रूप में अपने भीतर समेटे अजन्मा, सर्वशक्तिमान, आत्मानंद नारायण लीन थे। 

कई युग बीत जाने पर जब सृष्टि का समय आया तो भगवान की नाभि से एक कमल विकसित हुआ जिसमें से ब्रह्मा प्रकट हुए। बिना किसी भौतिक पिता के उत्पन्न होने के कारण ब्रह्मा का एक नाम स्वयंभू (स्वयं जन्म लेने वाला) भी है।

कमल में स्थित ब्रह्मा को जब कोई लोक नहीं दिखाई दिया तो उन्होंने अपने चारों तरफ सिर घुमाया। इससे उनके चार सिर हो गए। वे बार-बार सोचने लगे  – मैं कौन हूँ? इस कमल का उद्गम कहाँ है? फिर वे समाधि में लीन हो गए। अपनी समाधि में उन्होंने सर्वशक्तिमान भगवान के दर्शन किए। उनकी प्रेरणा से उन्होंने सृष्टि का काम आरंभ किया।

नए युग की सृष्टि का काम आसान नहीं था। जब ब्रह्मा ने सृष्टि करनी चाही तो सबसे पहले अविद्या, मोह, राग, द्वेष आदि नकारात्मक प्रवृत्तियाँ आईं। ब्रह्मा ऐसी सृष्टि नहीं रचना चाहते थे जिसमें हर तरफ नकारात्मकता हो। 

उन्होंने पुनः भगवान का ध्यान किया और पवित्र होकर दूसरी बार सृष्टि करने का प्रयास किया। इस बार उन्होंने सनक, सनन्दन, सनातन, सनत्कुमार  – इन चार मुनियों की सृष्टि की और उन्हें आदेश दिया  – पुत्रों! जाओ, अब तुम लोग संतान उत्पन्न कर इस सृष्टि का विस्तार करो। किन्तु, इन मुनियों की प्रवृत्ति ज्ञान और भक्ति की ओर थी। जगत के विषयों में उनकी थोड़ी भी रुचि नहीं थी। उन्होंने ब्रह्मा के आदेश का पालन नहीं किया।

ब्रह्मा को अपने पुत्रों से यह अपेक्षा नहीं थी। उन्हें अपने पुत्रों की अवज्ञा से बहुत क्रोध आया जिसे उन्होंने दबाना चाहा। किन्तु, उनका दबा क्रोध एक बालक के रूप में उनकी दोनों भौंहों के बीच से बाहर निकल आया। उस बालक का रंग नीला-लाल था। उसने जोर-जोर से रोते हुए ब्रह्मा से पूछा- हे विधाता! मुझे बताओ, मैं कौन हूँ? और, मेरे रहने का स्थान कहाँ है?

ब्रह्मा ने कहा – तुम जन्म लेते ही रोए, इसलिए तुम्हारा नाम ‘रुद्र ‘ होगा। तुम्हें ग्यारह अन्य नामों से भी जाना जाएगा – मन्यु, मनु, महिनस, महान, शिव, ऋतध्वज, उग्ररेता, भव, काल, वामदेव, धृतव्रत। तुम्हारे रहने के ग्यारह स्थान होंगे- हृदय, आकाश, इंद्रियाँ, प्राण, वायु, अग्नि, जल, पृथ्वी, सूर्य, चंद्र, तप। तुम्हारी ग्यारह रुद्राणियाँ होंगी। तुम प्रजापति हो, और, तुम्हारा कर्तव्य है कि तुम सृष्टि का विस्तार करो।

रुद्र आज्ञाकारी था। उसने ब्रह्मा की आज्ञा मान ली। किंतु, उसकी संतानें भी उसी के समान रौद्र स्वभाव की निकलीं। उनके बल, स्वभाव और भीषण कर्म को देख कर ब्रह्मा चिंतित हो गए। उन्होंने सोचा कि संसार में यदि केवल ऐसे प्राणी हों जिनमें क्रोध और विध्वंसक प्रवृत्तियाँ प्रधान हों तो संसार का कल्याण नहीं हो सकता।  

ब्रह्मा ने तब रुद्र को बुलाकर कहा- हे सुरश्रेष्ठ! तुम्हारी संतानें बहुत विध्वंसक हैं। उनके कर्मों को देखकर भय और दुख उत्पन्न होता है। अब ऐसी सृष्टि और न रचो। तुम तप करो और उससे शुद्ध होकर संसार के कल्याण के लिए पुनः सृष्टि करना। रुद्र ने उनकी बात मान ली और तपस्या करने के लिए वन में चला गया। 

ब्रह्मा ने तब दस और पुत्रों को उत्पन्न किया – मरीचि, अत्रि, अङिरा, पुलस्त्य, पुलह, क्रतु, भृगु, वसिष्ठ, दक्ष, और नारद। किन्तु, इन पुत्रों से भी संसार की अपेक्षित    जनसंख्या नहीं बढ़ी।

ब्रह्मा जब चिंतित होकर इस विषय पर विचार कर रहे थे, तभी उनके शरीर के एक भाग से एक पुरुष निकला जिसका नाम स्वायंभुव मनु  हुआ और उनके दूसरे भाग से एक स्त्री निकली जिसका नाम शतरूपा हुआ। कालांतर में उन दोनों की संतानों से सारा जगत भर गया।  

(मूल ग्रंथ पर आधारित)

श्याम चतुर्वेदी 

मैत्रेय ने कहा- ब्रह्मा के शरीर के दो भागों से मनु और शतरूपा का आविर्भाव हुआ। मनु ने विनम्रता से हाथ जोड़कर ब्रह्मा से पूछा  –  हे जगत के पिता! हमारे लिए आपका क्या आदेश है? हम क्या करें जिससे इस लोक में हमारा यश हो और परलोक में भी सद्गति मिले?

ब्रह्मा ने प्रसन्नता से कहा- हे वीर! पिता के प्रति तुम्हारा यह सम्मान और समर्पण प्रशंसनीय है। अभी तुम्हारा यही कर्तव्य है कि तुम शतरूपा के सहयोग से अपनी तरह ही गुणों वाली संतति उत्पन्न करो और पृथ्वी पर सृष्टि का विस्तार करो।  फिर अपनी प्रजा का धर्मपूर्वक पालन करो। 

मनु ने कहा  – हे पिताजी, आपकी आज्ञा शिरोधार्य है। किन्तु, हमें इस समय हमारे एवं हमारी भावी प्रजा के रहने के लिए कोई स्थान नहीं दिखाई देता। समस्त पृथ्वी तो जल में डूबी हुई है। 

मनु की बात सुनकर ब्रह्मा सोच में पड़ गए कि पृथ्वी का उद्धार कैसे हो। यह काम इतना कठिन था कि इसे सर्वशक्तिमान भगवान के सिवाय और कोई नहीं कर सकता था। 

जब ब्रह्मा यह सोच रहे थे, तभी उनकी नाक के एक छिद्र से अँगूठे के बराबर एक वराह (सूअर) निकल आया। उसने देखते-ही-देखते अपना विस्तार पर्वत के समान कर लिया। उसके प्रचंड तेज और गर्जना से सारे लोक काँप गए। पृथ्वी के उद्धार के लिए भगवान का वराह-अवतार हो चुका था!

फिर भगवान ने बड़े वेग के साथ जल में प्रवेश किया। जल के भीतर पड़ी पृथ्वी पर हिरण्याक्ष ने अपना अधिकार जमा लिया था। उसने जब भगवान को युद्ध की चुनौती दी तो उन्होंने उसका वध कर दिया और पृथ्वी को जल से बाहर ले आए। 

यह सुनकर विदुर ने अनुरोध किया  – मुनिवर! भगवान द्वारा पृथ्वी के उद्धार की कथा कृपया विस्तार से बताएँ।  हिरण्याक्ष कौन था? उसने भगवान से युद्ध क्यों किया?

मैत्रेय ने कहा – मैं हिरण्याक्ष के जन्म की कथा सुनाता हूँ। एक बार दक्ष-पुत्री दिति ने अपने पति कश्यप से यह प्रार्थना की – हे विद्वन्! अपनी सौतों को पुत्रवती देखकर आज मेरी भी संतान पाने की इच्छा बहुत बलवती हो गई है। मैं अब और प्रतीक्षा नहीं कर सकती। 

उस समय संध्या-काल था। कश्यप सायंकालीन उपासना के लिए बैठे थे। उन्होंने अपनी पत्नी को समझाते हुए कहा – हे गृहस्वामिनी! तुम्हारी भी संतान अवश्य होगी। पत्नी की इच्छा-पूर्ति करना पति का धर्म होता है। क्योंकि, गृहस्थ आश्रम में पत्नी के सहयोग से ही पति अपने सारे कर्तव्यों के पालन करने का समय और सामर्थ्य पाता है। पत्नी उसे कुमार्ग पर जाने से बचाती है। किन्तु, इस समय तुम थोड़ा धैर्य धरो। गर्भाधान के लिए संध्या-काल शुभ नहीं होता। इस समय भगवान रुद्र अपने सहचरों भूत-प्रेतों के साथ विचरण करते हैं। कोई भी अशुभ आचरण उनकी दृष्टि से छिपा नहीं रह सकता। 

किन्तु, दिति अपनी इच्छा के अधीन होकर सही-गलत की समझ खो चुकी थी। कश्यप के लाख समझाने पर भी उस पर कोई प्रभाव नहीं पड़ा। 

तब ‘ दैव की जैसी इच्छा ‘ सोचकर विवश कश्यप ने अपनी पत्नी के दुराग्रह को मान लिया। फिर स्नान कर वे सांध्योपासना में लग गए।  

उधर भावना के क्षणिक आवेश में अपना नियंत्रण खो देने के कारण दिति को बहुत ग्लानि हुई। वह अपने पति के पास गई और सिर नीचा कर कहने लगी – हे स्वामी, मैं आपकी और भगवान रुद्र की अपराधिणी हूँ। मुझे क्षमा करें। मुझे भय है कि भगवान रुद्र के कोप से कहीं मेरा गर्भ नष्ट न हो जाए..! 

कश्यप ने अपनी दृष्टि उठा कर देखा  – दिति भय और अपराधबोध से थर-थर काँप रही थी। उन्होंने कहा  – अमंगलकारी स्त्री! गर्भाधान के लिए तुम्हारा दुराग्रह हर तरह से अनुचित था। इसके चार कारण थे – उस समय तुम्हारा मन काम-वासना से मलिन था, वह मुहूर्त शुभ नहीं था, तुमने अपने पति की बात नहीं मानी और तुमने देवताओं का भी आदर नहीं किया। अब इसका परिणाम यह होगा कि तुम्हारी कोख से दो बड़े ही अधम और अशुभ पुत्र जन्म लेंगे। उनके अत्याचारों से पृथ्वी काँप उठेगी। उनके हाथों अनगिनत निरपराध लोग मारे जाएँगे, स्त्रियों पर अत्याचार होगा और महात्माओं का क्षोभ बढ़ेगा। उस समय भगवान को स्वयं अवतार लेना होगा। तुम्हारे पुत्रों को मार कर वे जगत का कल्याण करेंगे। 

कश्यप की बात सुनकर दिति सन्न रह गई। कुछ देर बाद उसने धीरे-से कहा – मैं और क्या कहूँ..? मैं तो अब बस इतने से ही संतोष कर सकती हूँ कि भगवान के हाथों मेरे पुत्रों की मृत्यु होगी, इसी में उनका भी कल्याण होगा। 

फिर वह चुप हो गई।

कश्यप ने देखा कि दिति का चित्त उसके पश्चाताप की अग्नि में शुद्ध हो गया है। तब उन्होंने कोमल स्वर में उससे कहा  – हे देवि! तुम्हें अपने किए पर शोक और पश्चाताप हुआ। तुम्हें उचित-अनुचित का ज्ञान भी हो गया। और, तुमने भगवान विष्णु, शिव और मेरे प्रति अपना आदर भी दिखाया। इसलिए, तुम्हारे इन दोनों पुत्रों में से एक का ऐसा पुत्र होगा जो भगवान का महान भक्त होगा।  वह विषयों में अनासक्त, शीलवान, सर्वगुणसंपन्न, दूसरों के सुख में सुखी और दुख में दुखी होनेवाला होगा। सारे महापुरुष उसके गुण गायेंगे। उसकी भक्ति से प्रसन्न होकर साक्षात भगवान उसे दर्शन देंगे।

कश्यप की बातों से दिति को बहुत सांत्वना मिली।  

(मूल ग्रंथ श्रीमद्भागवत पुराण पर आधारित)

(अगले अंक में – हिरण्याक्ष का जन्म)

श्याम चतुर्वेदी 

मैत्रेय ने कहा – दिति के दो पुत्र हुए – हिरण्याक्ष और हिरण्यकशिपु। उनके जन्म की कथा इस प्रकार है –

एक बार ब्रह्मा के मानस-पुत्र सनकादि मुनि भगवान के दर्शन की अभिलाषा से वैकुण्ठ लोक पहुँचे। वे मुनि आयु और ज्ञान में यद्यपि बहुत बड़े थे, किन्तु वे सदा पाँच वर्ष के बच्चों की तरह दिखाई पड़ते थे। दिशाएँ ही उनका वस्त्र थीं। वे दिगंबर थे। 

वैकुण्ठ के छह द्वारों को पार कर जब वे सातवें द्वार पर पहुँच तो वहाँ उन्हें जय और विजय नामक दो द्वारपाल मिले। उन्होंने मुनियों का वास्तविक स्वरूप नहीं पहचाना और उन्हें साधारण बालक समझकर अपने डंडों से द्वार पर ही रोक दिया। मुनियों का अद्भुत तेज देखकर भी  उनके मन में श्रद्धा का भाव नहीं आया।

मुनियों को उन द्वारपालों के इस विचित्र एवं उद्दंड व्यवहार से बड़ा आश्चर्य और क्रोध हुआ। उन्होंने कहा – भगवान और उनके भक्तों के बीच क्या बाधा हो सकती है? वैकुण्ठ में तो प्रत्येक निवासी भगवान विष्णु की तरह ही गुणों वाला होता है। फिर तुम दोनों हमें इस तरह रोकने वाले कौन हो? तुममें अभी भी एक वैकुण्ठ-निवासी होने के गुण नहीं हैं। इसलिए तुम लोगों के कल्याण के लिए यही उचित है कि तुम दोनों वैकुण्ठ लोक से निकल कर उस योनि में चले जाओ जहाँ प्राणियों के तीन शत्रु  – काम, क्रोध, लोभ  – निवास करते हैं। 

मुनियों के उन कठोर वचनों को सुनकर द्वारपाल उनके चरणों में गिर पड़े और कहा  – भगवन् ! हमारे अपराध के लिए दिया गया आपका दंड हमें स्वीकार है। आपसे हमारी केवल यही प्रार्थना है कि हम चाहे किसी भी योनि में रहें, हम भगवान को कभी न भूलें।

उधर जब भगवान को अपने सेवकों के बारे में यह समाचार मिला तो वे लक्ष्मी सहित वहाँ पहुँच गए। सनकादि मुनिगण अपने आराध्य को साक्षात देख कर भक्तिविह्वल होकर उनकी स्तुति करने लगे। 

भगवान ने कहा  – मुनिगण! मैं अपने सेवकों द्वारा किए गए दुर्व्यवहार के लिए आपसे क्षमा माँगता हूँ। सेवकों के अपराध करने पर संसार उनके स्वामी को ही उत्तरदायी समझता है। आप मेरे इन सेवकों पर बस इतनी कृपा करें कि इनका निर्वासन काल शीघ्र समाप्त हो जाए और ये अपने अपराध का फल भोग कर मेरे पास लौट जाएँ।

भगवान के ऐसे विनम्र वचन सुनकर मुनिगण श्रद्धा से अभिभूत हो गए।  उनके मन में अपने क्रोध के लिए घोर पश्चाताप हुआ। उन्होंने हाथ जोड़कर भगवान से विनती की  – हे समस्त लोकों के सर्वशक्तिमान स्वामी! अपने सेवकों के प्रति आपकी यह उदारता अद्भुत है। हमने क्रोधवश आपके निरपराध सेवकों को शाप दे दिया है। उसके लिए आप हमें जो भी दंड दें, हमें स्वीकार है। 

भगवान बोले  – मुनिगण! आप दुखी न हों। आप लोगों ने मेरी प्रेरणा से ही इन्हें शाप दिया है। ये अब दैत्य योनि में जन्म लेंगे। किंतु, वहाँ भी मेरे प्रति घोर शत्रुता के भाव से ये मुझसे निरंतर जुड़े रहेंगे। मेरे निरंतर स्मरण के प्रभाव से इनकी शुद्धि हो जाएगी और ये मेरे पास लौट आएँगे। 

भगवान के इस कथन से मुनियों का संताप कुछ कम हो गया। फिर उन्होंने भगवान की आज्ञा लेकर वहाँ से प्रस्थान किया।  

भगवान ने तब जय-विजय को कहा  – तुम लोगों का कल्याण हो। मुनियों के शाप को मैं निरस्त कर सकता हूँ, किन्तु मैं ऐसा नहीं करूँगा। इसके पहले तुम लोगों ने एक बार लक्ष्मीजी को इसी तरह प्रवेश करने से रोका था जब मैं योग निद्रा में लीन था।  मुनियों के इस शाप में लक्ष्मीजी का क्रोध भी सम्मिलित है।  अब तुम लोग यहाँ से जाओ। मेरा सतत ध्यान करने के कारण  – भले ही वह शत्रुता के भाव से ही क्यों न हो  – तुम्हें मुक्ति मिल जाएगी और तुम लोग मेरे पास लौट आओगे। 

भगवान के उन्हीं द्वारपालों  जय-विजय ने दिति के गर्भ से हिरण्याक्ष और हिरण्यकशिपु के रूप में जन्म लिया।

(मूल ग्रंथ श्रीमद्भागवत पर आधारित)

श्याम चतुर्वेदी  

दिति के गर्भ से हिरण्याक्ष और हिरण्यकशिपु के जन्म लेते ही तीनों लोकों में हजारों अशुभ संकेत प्रकट होने लगे। पृथ्वी और पर्वत काँपने लगे। समुद्र अशांत हो गया। देव-मूर्तियों की आँखों से आँसू बहने लगे। आँधी के बिना ही वृक्ष उखड़-उखड़ कर गिरने लगे। बादल कहीं नहीं थे, किन्तु उनका घोर गर्जन हर तरफ सुनाई देता था। गुफाओं से रथ के चलने की-सी घरघराहट सुनाई देने लगी। भयभीत पक्षी अपने घोंसले से निकल कर इधर-उधर उड़ने लगे। 

देखते-ही-देखते दोनों भाई बड़े होने लगे। उनका शारीरिक बल असाधारण था।

हिरण्याक्ष को युद्ध का बहुत चाव था। एक दिन वह अपने बराबर योद्धा खोजता हुआ हाथ में गदा लेकर स्वर्गलोक जा पहुँचा। उसे देखते ही इन्द्र समेत सारे देवता भयभीत हो कर इधर-उधर छिप गए। हिरण्याक्ष ने बार-बार गर्जना कर देवताओं को युद्ध की चुनौती दी। किन्तु, किसी में भी उसकी चुनौती स्वीकार करने का साहस नहीं था।

देवताओं की कायरता से निराश होकर हिरण्याक्ष समुद्र की ओर चल पड़ा जहाँ वरुण की राजधानी विभावरीपुरी थी। वरुण पाताल-लोक और वहाँ रहने वाले जलचरों का स्वामी था। 

हिरण्याक्ष ने व्यंग्य से वरुण को कहा  – महाराज, आप तो वही वीर हैं न, जिसने कभी समस्त दैत्यों को हरा कर राजसूय यज्ञ किया था? आज मैं आपसे युद्ध की भिक्षा माँगता हूँ। निराश न करें!

वरुण बुद्धिमान था। हिरण्याक्ष की बातों को सुनकर उसे क्रोध तो बहुत आया किन्तु स्थिति की गंभीरता को देखते हुए उसने अपना क्रोध पी लिया। उसने संयमित स्वर में कहा  – दैत्यराज! अब मुझे युद्ध में कोई रुचि नहीं रह गई है। तुमसे युद्ध कर सके, ऐसा मैं कोई अन्य प्राणी भी नहीं देखता हूँ। हाँ, भगवान तुम्हारी युद्ध की इच्छा को संतुष्ट कर सकते हैं। तुम उन्हीं के पास जाओ। वे तुम्हारा सारा घमंड चूर कर देंगे। उनके हाथों तुम्हें वीरगति मिलेगी। अंत में, वहाँ बस तुम्हारा क्षत-विक्षत मृत शरीर होगा और उसे खाने को लोलुप चारों तरफ कुत्ते!

वरुण के कठोर वचनों पर हिरण्याक्ष ने कोई ध्यान नहीं दिया। भगवान से युद्ध की कल्पना ने उसमें अदम्य उत्साह भर दिया था। नारदजी से पता कर भगवान को ढूँढता हुआ वह शीघ्र ही रसातल पहुँच गया जहाँ वे अपने वाराह-रूप में अवतार लेकर पृथ्वी को जल के ऊपर ला रहे थे।

हिरण्याक्ष ने भगवान को तिरस्कार के साथ कहा  –  अरे शूकर-रूप वाले मायावी! इस पृथ्वी को यहीं छोड़ दे।  ब्रह्मा ने इस पर हमारा अधिकार दिया है। मेरे होते हुए तुम इसे नहीं ले जा सकते। वैसे भी, तुम्हारा कोई अपना पुरुषार्थ तो कभी रहा नहीं। तुमने सदा दैत्यों को अपनी माया से ही जीता है। आज तुझे मारकर मैं अपने बंधुओं का शोक दूर करूँगा। तेरी मृत्यु के साथ ही तुझ पर पलने वाले सारे देवता और ऋषि उसी तरह अपने-आप नष्ट हो जाएँगे जैसे जड़ कट जाने पर वृक्ष नष्ट हो जाते हैं!

भगवान ने पहले पृथ्वी को जल के ऊपर स्थित किया और फिर हिरण्याक्ष के साथ गदा-युद्ध में लग गए।  ब्रह्मा सहित सारे ऋषि-गण भी इस युद्ध को देखने की इच्छा से वहाँ पहुँच गए। 

हिरण्याक्ष असाधारण योद्धा था। भगवान ने उसकी युद्ध की इच्छा और वीरता को पर्याप्त सम्मान देते हुए उससे युद्ध किया। उधर जब दिन ढलने लगा और युद्ध के समाप्त होने का कोई लक्षण नहीं दिखाई दिया तो ब्रह्मा ने चिंतित होकर भगवान से विनती की  – हे भगवान, इसके साथ आप अब और क्रीड़ा नहीं करें। अब संध्या वेला आने वाली है। अंधकार के साथ इस दुष्ट की शक्ति और बढ़ जाएगी। बहुत सौभाग्य से यह आज आपके सामने आया है। इसकी मृत्यु भी आपके हाथों लिखी है। आप कृपया इसका शीघ्र वध कर समस्त लोकों का भय दूर करें।

भगवान ने तब अपने एक प्रहार से हिरण्याक्ष को मार डाला। हिरण्याक्ष एक विशाल वृक्ष की तरह भूमि पर गिर पड़ा। भगवान पर दृष्टि एवं मन एकाग्र रखने के कारण मृत्यु के पश्चात भी उसका तेज मंद नहीं हुआ।  ब्रह्मा ने विस्मय से उसे देखते हुए कहा – योगियों के लिए भी ऐसी मृत्यु दुर्लभ है। यह हिरण्याक्ष कितना भाग्यशाली है जिसने भगवान का मुख देखते हुए अपना शरीर त्यागा है!

(मूल ग्रंथ श्रीमद्भागवत पुराण पर आधारित)

श्याम चतुर्वेदी 

विदुर के अनुरोध पर मैत्रेय ने स्वायंभुव मनु के वंश का  यह वर्णन किया – 

मनु-शतरूपा के दो पुत्र हुए – प्रियव्रत और उत्तानपाद। उनकी तीन कन्याएँ भी हुईं – आकूति, देवहूति और प्रसूति। मैं पहले देवहूति-कर्दम के बारे में बताता हूँ जिनके माध्यम से भगवान ने अपने अंश-रूप कपिल के रूप में जन्म लिया। 

कर्दम प्रजापति थे। उन्हें ब्रह्मा ने आज्ञा दी कि वे सृष्टि के हित में संतान उत्पन्न करें। यह एक कठिन दायित्व था। कर्दम ने स्वयं को तैयार करने के लिए सरस्वती नदी के तट पर कठोर तपस्या आरंभ की। दस हजार वर्ष बीत गए। तब उनकी तपस्या से प्रसन्न होकर भगवान ने उन्हें दर्शन दिए और कहा – महामुने! दो दिनों के बाद आपका विवाह मनु-शतरूपा की योग्य पुत्री देवहूति के साथ होगा। आप लोगों की नौ कन्याएँ होंगी। मैं भी कपिल के रूप में आप लोगों का पुत्र बन कर अंशावतार लूँगा और सांख्य-शास्त्र का निरूपण करूँगा।

दो दिनों के बाद मनु-शतरूपा अपनी पुत्री देवहूति के साथ वहाँ पधारे और कर्दम से अपनी पुत्री के पाणिग्रहण का अनुरोध किया। कर्दम ने कहा – मुझे आपका प्रस्ताव सहर्ष स्वीकार है, किंतु मेरी एक शर्त है। जब तक हमारी सारी संतानें नहीं हो जातीं, तब तक मैं गृहस्थ-धर्म का पालन करते हुए इसके साथ रहूँगा। इसके बाद मैं संन्यास ले कर घर से चला जाऊँगा।

मनु-शतरूपा ने कर्दम की शर्त स्वीकार कर ली। फिर देवहूति का उनसे विवाह कर दोनों अपनी राजधानी लौट गए। 

कर्दम और देवहूति  में एक-दूसरे के प्रति बहुत प्रेम और सम्मान था। कर्दम ने अपनी पत्नी की प्रसन्नता के लिए एक दिव्य विमान रचा जो इच्छानुसार कहीं भी ले जाया सकता था। इस विमान में सुख-सुविधा की सारी सामग्रियाँ थीं। इसमें बैठ कर दंपति ने संपूर्ण भूमंडल में भ्रमण किया और फिर आश्रम लौट गए।  

समय आने पर कर्दम-देवहूति की नौ कन्याएँ और एक पुत्र हुआ। 

विवाह योग्य होने पर इन कन्याओं का इस तरह विवाह हुआ – कला, अनुसूया, श्रद्धा, हविर्भू, गति, क्रिया, ख्याति, अरुन्धती, शांति का क्रमशः मरीचि, अत्रि, अङिरा, पुलस्त्य, पुलह, क्रतु, भृगु, वसिष्ठ और अथर्वा के साथ।

इसके बाद कर्दम ने भगवान के अंशावतार अपने पुत्र कपिल से यह निवेदन किया – प्रभो! आपकी कृपा से मैंने अपना गृहस्थ-धर्म पूरा कर लिया है। आप मुझे अनुमति दें कि मैं अब संन्यास-मार्ग ग्रहण करूँ। मेरे हृदय में आप के सिवा और कुछ न रहे! 

भगवान कपिल ने कहा  – मुने! आप अपनी इच्छानुसार जाएँ। आप अपने संपूर्ण कर्म मुझे अर्पित करते हुए अंत में मोक्ष प्राप्त करें। समय आने पर माता को भी मैं आत्मज्ञान कराने वाला उपदेश दूँगा जिससे वे समस्त सांसारिक कष्टों से मुक्त हो जाएँगी। 

भगवान कपिल के इस प्रकार कहने पर कर्दम ने उनकी परिक्रमा की और वन के लिए प्रस्थान किया।  

कपिल अपनी माता के साथ आश्रम में ही रहने लगे।  एक दिन देवहूति ने उनसे कहा – भगवान! अब मैं  सांसारिक विषयों से थक गई हूँ। आप कृपया मुझे मेरी मुक्ति का मार्ग बताएँ। 

भगवान कपिल ने कहा – माता! मन ही जीव के बंधन और मुक्ति दोनों का कारण है। सांसारिक सुखों में आसक्त होने पर यह बंधन का कारण हो जाता है; परमात्मा में लग जाए तो यही मुक्ति का साधन बन जाता है। जिसके हृदय में ज्ञान-वैराग्य और भक्ति है और जो अपने समस्त कर्म मुझे अर्पित कर देता है, वह जीव मुक्त हो जाता है। 

(मूल ग्रंथ श्रीमद्भागवत पुराण पर आधारित)

श्याम चतुर्वेदी 

(अगले अंक में – भक्ति की दुर्दशा एवं नारदजी का आगमन)

मैत्रेय बोले  –  दक्ष प्रजापति ने मनु-शतरूपा की पुत्री प्रसूति से विवाह किया। उनकी सोलह कन्याएँ हुईं। उनमें से एक कन्या सती का विवाह शिवजी से हुआ। 

विदुर ने जिज्ञासा की  – दक्ष अपनी पुत्री सती से बहुत स्नेह करता था। महादेवजी भी शांत स्वभाव के और शीलवान थे।  फिर दक्ष को अपने दामाद से इतना द्वेष क्यों हो गया जिसके कारण सती को अपने प्राण तक त्याग देने पड़े?

मैत्रेय ने कहा – एक बार प्रजापतियों के यज्ञ में ब्रह्मा और शिवजी सहित समस्त देवता, ऋषिगण आदि उपस्थित हुए। उस अवसर पर जब दक्ष प्रजापति का यज्ञ-सभा में प्रवेश हुआ तो उसके तेज और वैभव से  अभिभूत होकर सारे लोग अपने आसन से उठ खड़े हुए। केवल ब्रह्मा और शिवजी ही बैठे रहे। 

शिवजी का यह आचरण दक्ष को बहुत बुरा लगा। उसने सोचा, ब्रह्मा के बैठे रहने की बात समझ में आती है, क्योंकि वे मेरे पिता हैं; किन्तु, शिव तो मेरा दामाद है!

सबसे मिलकर जब वह अपने आसन पर बैठा तो उसने कहा – यहाँ सभा में उपस्थित समस्त देवता एवं ऋषिगण मेरी बात सुनें। यह महादेव मेरा दामाद होने के नाते मेरे पुत्र के समान है। अतः शिष्टाचार की दृष्टि से इसे मेरा सम्मान करना चाहिये था। किंतु, इसने तो अपनी वाणी तक से मेरा सत्कार नहीं किया। 

अपने क्रोध में दक्ष को यह विवेक नहीं रहा कि वह क्या बोल रहा है। उसने कहा – मुझे दुख है कि मैंने ब्रह्मा जी के कहने पर अपनी प्यारी कन्या इसे सौंप दी। यह किसी भी तरह मेरी कन्या के योग्य नहीं है। इसका केवल नाम ‘शिव’ (शुभ, मंगलकारी) है; इसका आचरण सर्वथा विपरीत है। यह अपने शरीर में चिता की भस्म लगाए, नरमुण्डोॅ की माला पहनकर पागलों की तरह इधर-उधर विचरण करता रहता है, अकारण कभी हँसता है, कभी रोता है। जैसा यह मतवाला है, इसके तमोगुणी अनुयायी भूत-प्रेत भी वैसे ही मतवाले हैं।

दक्ष के अभिमान को बहुत चोट पहुँची थी। वह घायल साँप की तरह अपने भीतर का विष वमन कर रहा था। किन्तु, भगवान शिव ने दक्ष के कठोर वचनों पर अपनी कोई प्रतिक्रिया नहीं दिखाई। 

शिवजी की इस उदासीनता ने दक्ष की क्रोधाग्नि में घी का काम किया। क्रोध के आवेश में बिना आगे-पीछे विचारे उसने तब यह निर्णय सुनाया – आज के बाद किसी भी यज्ञ में महादेव को कोई भाग नहीं मिले!

दक्ष के इस अविवेकपूर्ण व्यवहार पर भगवान शिव के प्रमुख पार्षद नंदी को बहुत क्रोध आया। उन्होंने उसे संबोधित करते हुए कहा- तुम्हारी दृष्टि पशुओं की तरह है जो कभी शरीर के परे नहीं जा सकती। इसलिए शीघ्र ही तुम्हारा सिर बकरे का हो जाए! इस बात पर चिढ़ कर दक्ष के समर्थकों ने शिवजी के अनुयायियों को बुरा-भला कहना शुरू किया। दोनों पक्षों के पारस्परिक कलह से खिन्न होकर शिवजी अपने अनुयायियों को लेकर वहाँ से उठ कर चल दिए। 

बाकी बचे लोगों ने यज्ञ संपन्न किया। 

कालांतर में जब ब्रह्मा ने दक्ष को सारे प्रजापतियों का अधिपति बना दिया तो उसका गर्व और बढ़ गया। उसने एक बार वृहस्पतिसव यज्ञ का आयोजन किया जिसमें उसने भगवान शिव के सिवा शेष सबको आमंत्रित किया।  

आकाश-मार्ग से अपने दिव्य विमानों से जाते देवताओं की आपसी बातचीत सुन कर सती को पता चला कि उनके पिता ने कोई यज्ञ आयोजित किया है। उन्होंने जब अपने पतियों के साथ सज-संवर कर उत्साह से चहकती जाती गंधर्वों और यक्षों की पत्नियों को देखा तो उनका मन भी यज्ञ में सम्मिलित होने और अपनी माँ एवं बहनों और दूसरे आत्मीय जनों से मिलने के लिए व्याकुल हो गया। वे बार-बार भगवान शिव को यज्ञ में चलने के लिए मनाने लगीं। उन्होंने यह भी कहा – पति, गुरु और माता-पिता के यहाँ जाने के लिए किसी आमंत्रण की आवश्कता नहीं होती।  

शिवजी को दक्ष के कठोर वचन याद थे। उन्होंने सती को समझाते हुए कहा  – आपका कहना ठीक है कि बंधुओं के यहाँ बिना बुलाए भी जाया जा सकता है। किंतु, जिन बंधुओं में देहाभिमान, मद, क्रोध, द्वेष हो, उनके पास हमें नहीं जाना चाहिए। विद्या, तप, धन, सुदृढ़ शरीर, युवावस्था और उच्च कुल  – ये छह बातें सत्पुरुषों में गुणों की वृद्धि करती हैं, किंतु, नीच पुरुषों में उनके अवगुणों की ही वृद्धि करती हैं। 

हे सती! आप सोचती होंगी कि मैंने पिछले यज्ञ में सबकी तरह उठ कर दक्ष का अभिवादन क्यों नहीं किया था। इसका सीधा कारण है कि सामान्य लोगों की तरह तत्त्वदर्शी कभी भी देहाभिमानी पुरुष के प्रति सम्मान नहीं दिखाते हैं। उनका ढंग अलग है। वे सबके भीतर स्थित वासुदेव को ही नमस्कार करते हैं। दक्ष इस बात को नहीं समझ सका।  

हे सती! आप भले ही दक्ष की प्रिय पुत्री हैं, किन्तु हमारी पत्नी भी हैं। इस नाते आपको वहाँ समुचित आदर मिलने की संभावना नहीं है। आप ध्यान रखें, स्वाभिमानी व्यक्ति को जब अपने आत्मीय जनों द्वारा अपमान मिलता है तो वह तत्काल  मृत्यु का कारण भी बन सकता है। 

इधर पति के वचन और उधर अपने आत्मीय जनों से मिलने की उत्कंठा के बीच सती बहुत देर तक झूलती रहीं। फिर अंत में, वे अपनी भावनाओं के वश में आकर अकेली ही तेजी से अपने माता-पिता के घर चल पड़ीं। उन्हें इस तरह जाते देख कर भगवान शिव के हजारों सेवक भी उनके साथ हो लिए।  

दक्ष की यज्ञशाला में पहुँचने पर सती ने देखा कि वहाँ शिवजी के लिए कोई भाग नहीं रखा है। कहीं दक्ष अप्रसन्न न हो जाए, इस आशंका से वहाँ किसी ने उनका सत्कार नहीं किया। हाँ, उनकी माँ और बहनें उनसे बहुत प्रेम और उत्साह से मिलीं। किन्तु अपने पति के अपमान के कारण क्रुद्ध सती का ध्यान उधर नहीं था।  

दक्ष द्वारा भगवान शिव का अनादर किए जाने पर उनके सेवकों को भी बहुत क्रोध आया। वे जब दक्ष को दंड देने के लिए उसकी ओर बढ़ने लगे तो सती ने उन्हें रोक दिया।

फिर दक्ष को संबोधित करते हुए सती ने कहा – पिताजी! जिन शिव के नाम के उच्चारण मात्र से मनुष्य के सारे पाप नष्ट हो जाते हैं, जिनका न कोई प्रिय है न ही अप्रिय, जो सभी देहधारियों की आत्मा हैं, और जिनके चरणों की  धूल ब्रह्मा आदि देवता अपने सिर पर धारण करते हैं, आप ऐसे भगवान शिव से द्वेष करते हैं? 

अपने शुभचिंतक पति की सलाह न मानने का पश्चाताप और पिता द्वारा पति के अपमान से उपजे क्रोध से सती थर-थर काँपने लगीं। उन्होंने कहा  – मुझे आपकी पुत्री होने पर धिक्कार है! मैं अब अपने पति के पास नहीं लौटना चाहती हूँ। क्योंकि, जिस समय वे मुझे दाक्षायणी (दक्ष की पुत्री) कह कर संबोधित करेंगे, मुझे आपकी पुत्री होने का स्मरण हो जाएगा। वह क्षण देखने के पहले ही मैं आपसे उत्पन्न हुए अपने इस शव-तुल्य शरीर को अभी इसी क्षण त्याग देती हूँ।  

यह कहकर सती उत्तर दिशा की ओर मुँह कर भूमि पर बैठ गईं। उन्होंने जल से आचमन कर पीला वस्त्र ओढ़ लिया। योग-क्रिया के द्वारा अपने अंगों में अग्नि और वायु की धारणा कर उन्होंने भगवान शिव के चरणों में अपना ध्यान लगा दिया। कुछ ही क्षणों में सबके देखते- ही-देखते उनका शरीर योगाग्नि में भस्मीभूत हो गया।

(मूल ग्रंथ श्रीमद्भागवत पुराण पर आधारित)

(अगले अंक में  – भगवान शिव के गणों द्वारा दक्ष के यज्ञ का विध्वंस – भाग 2)

श्याम चतुर्वेदी 

दक्ष द्वारा अपने पति शिवजी के अपमान से कुपित होकर सती ने दक्ष की यज्ञ-सभा में ही योगाग्नि द्वारा आत्मदाह कर लिया। यह एक अत्यंत हृदयविदारक दृश्य था जिसे देख कर सारे लोकों में हाहाकार मच गया। यज्ञ में उपस्थित देवता और अन्य सभी अतिथि-गण दक्ष को धिक्कारने लगे – अहो! यह दक्ष कितना निष्ठुर है! सती-जैसी इसकी मनस्विनी पुत्री हर तरह से स्नेह और सम्मान पाने योग्य थी। किन्तु, जब वह प्राण त्यागने जा रही थी, इसने उसे रोका तक नहीं। दक्ष ने भारी अपराध किया है। इससे संसार में इसकी बड़ी अपकीर्ति होगी।

सती ने शिवजी के गणों को रोक रखा था, किन्तु, उनके देहत्याग करते ही गणों के क्रोध का बाँध टूट गया। वे दक्ष को मारने दौड़ पड़े। उनका प्रबल वेग देखकर भृगु मुनि ने दक्ष की रक्षा के लिए यज्ञ की अग्नि से ही ऋभु नामक हजारों देवता उत्पन्न कर दिए। इन शक्तिशाली देवताओं ने शिवजी के गणों पर आक्रमण कर उन्हें भगा डाला। 

उधर शिवजी को जब देवर्षि नारद द्वारा सती के प्राण-त्याग की सूचना मिली तो उनके क्रोध की सीमा नहीं रही। उन्होंने तत्काल अपनी जटा के एक केश से वीरभद्र नामक एक विकराल पुरुष की सृष्टि की और उसे आदेश दिया कि वह शिव-पार्षदों का अधिनायक बनकर जाए और दक्ष एवं उसके यज्ञ का नाश कर दे।  

शिवजी का आदेश पाकर वीरभद्र और अन्य सभी पार्षद भयानक आँधी की तरह घोर गर्जना करते हुए दक्ष की यज्ञ सभा की ओर चल पड़े। वहाँ पहुँचते ही उन्होंने सारा यज्ञ नष्ट कर डाला। वहाँ आए देवता एवं अन्य अतिथि-गण उनके आक्रमण से आहत होकर यज्ञ छोड़ कर भाग चले।  

वीरभद्र दक्ष की छाती पर सवार होकर उसका सिर काटने लगा। किन्तु, उसे आश्चर्य हुआ कि किसी भी अस्त्र से दक्ष का सिर नहीं कट रहा था। उसने कुछ देर इस पर विचार किया  – दक्ष पशु के समान है। इसलिए, इसे सम्भवतः सामान्य तरीके से नहीं काटा जा सकता।  यह सोचकर वह दक्ष को उस स्थान पर ले गया जहाँ पशुओं की बलि दी जाती थी। वहाँ उसने बड़ी आसानी से उसका सिर काटकर यज्ञ की अग्नि में फेंक दिया। 

शिवजी के आदेश का पालन कर वीरभद्र अन्य पार्षदों के साथ कैलास लौट आया। 

शिवजी के पार्षदों के आघात से पीड़ित देवता आदि गिरते-पड़ते ब्रह्मा के पास पहुँचे और उन्हें सारी घटना सुनाई। ब्रह्मा को पहले से पता था कि यज्ञ में शिवजी को भाग न देने के भारी दुष्परिणाम हो सकते थे। इसलिए वे स्वयं उस यज्ञ में नहीं गए थे।  

ब्रह्मा ने देवताओं से कहा  – तुम लोगों ने यज्ञ में शिवजी को उनका अधिकृत भाग न देकर बड़ी मूर्खता एवं अपराध किया। दक्ष के कठोर वचनों से वे पहले से ही खिन्न थे। उस पर उसी दक्ष के कारण उनकी प्रिया सती ने भी अपने प्राण त्याग दिए। शिवजी का क्रोध अत्यंत विकट है। उनकी शक्ति और सामर्थ्य को तो मैं भी नहीं जानता। हाँ, मैं इतना जानता हूँ कि वे बहुत शीघ्र ही प्रसन्न भी हो जाते हैं। इसलिए, तुम सभी हमारे साथ उनके पास चलो और उनसे अपनी भूल के लिए क्षमा याचना करो। बिना उनके आशीर्वाद के तुम्हारा यज्ञ कभी पूरा नहीं हो सकता। 

यह  कहकर ब्रह्मा सभी देवताओं, पितरों, ऋषियों, प्रजापतियों को लेकर भगवान शिव के धाम कैलास पहुँचे। वहाँ उन्होंने देखा कि वे एक विशाल वटवृक्ष के नीचे बैठकर सनक-आदि ऋषियों, कुबेर, नारद आदि को सनातन ब्रह्म का उपदेश दे रहे थे। उस समय वे उस काल की तरह दिखाई दे रहे थे जिसका क्रोध शांत हो गया हो। 

भगवान शिव के पास पहुँचकर देवताओं सहित ब्रह्मा ने उन्हें प्रणाम किया। भगवान शिव ने भी अपने आसन से  उठकर ब्रह्मा को सिर झुकाकर प्रणाम किया। ब्रह्मा ने दक्ष की मूर्खता की ओर इंगित करते हुए कहा – हे देव! आप संपूर्ण जगत के स्वामी हैं और प्रत्येक जीव में व्याप्त हैं। जो सर्वत्र, प्रत्येक जीव में आपको ही देखता है, वह कभी किसी पर क्रोध नहीं करता। किन्तु, जो मूर्ख सकाम कर्मों में ही लिप्त रहता है, दूसरों की उन्नति से जलता है और अपने  दुर्वचनों से दूसरों का हृदय दुखाता है, वह तो पहले ही मर चुका है। उसे और क्या मारना!

हे प्रभु! बुद्धिहीन दक्ष ने आपको यज्ञ के भाग से वंचित करके जो अपराध किया था, उसे उसका पर्याप्त दंड मिल चुका है। अब आप इस अधूरे यज्ञ का पुनरुद्धार करें। आप अपना यज्ञ-भाग ग्रहण करें और दक्ष को क्षमा करें। 

ब्रह्मा की बात सुनकर भगवान शिव ने हँसते हुए कहा – दक्ष नासमझ है। मुझे तो उसका दुर्व्यवहार अब याद भी नहीं है। मैंने तो बस उसको सावधान करने के लिए थोड़ा-सा दंड दे दिया। उसका सिर जल गया है, इसलिए अब उसे बकरे का सिर लगा दिया जाए। यज्ञ में उपस्थित देवता आदि जो भी मेरे पार्षदों के हाथों आहत हुए हैं, वे भी पुनः स्वस्थ हो जाएँ। 

फिर ब्रह्मा और देवताओं की प्रार्थना स्वीकार कर शिवजी दक्ष की यज्ञ शाला में पहुँचे। जब दक्ष को बकरे का सिर लगा दिया गया तो वह ऐसे जी उठा जैसे अभी-अभी सोकर उठा हो। उसने भगवान शिव की स्तुति करनी चाही,  किन्तु तभी उसे अपनी प्यारी पुत्री सती का स्मरण हो आया जिसे वह अपनी मूर्खता और दुराग्रह के कारण खो चुका था। अपनी पुत्री के प्रति स्नेह और  अपराध बोध से उसका हृदय भर गया और उसकी आँखों में आँसू भर आए। उसने कृतज्ञतापूर्वक  भगवान शिव द्वारा उसके अपराध को क्षमा कर देने के लिए उनका आभार जताया और अधूरा यज्ञ पूरा किया।

मैत्रेय ने यह कथा सुनाकर कहा – विदुरजी! मैंने सुना है कि सती ने कालांतर में हिमालय की पत्नी मेना के गर्भ से जन्म लिया और कठोर तपस्या के द्वारा भगवान शिव को पुनः पति के रूप में प्राप्त किया।  

(मूल ग्रंथ श्रीमद्भागवत पुराण पर आधारित)

श्याम चतुर्वेदी 

मनु-शतरूपा  के दो पुत्र हुए – प्रियव्रत और उत्तानपाद।  उत्तानपाद की दो पत्नियाँ थीं  – सुरुचि और सुनीति। सुरुचि से उत्तम और सुनीति से ध्रुव का जन्म हुआ। उत्तानपाद सुरुचि के प्रति अधिक अनुरक्त था। 

एक दिन राजा उत्तानपाद उत्तम को अपनी गोद में बिठाकर दुलार कर रहा था। उसी समय बालक ध्रुव वहाँ चला आया। अपनी बाल-सुलभ इच्छा से उसने भी पिता की गोद में बैठना चाहा, किन्तु राजा ने उसका स्वागत नहीं किया। वहाँ रानी सुरुचि भी थी। उसने ध्रुव को फटकारते हुए कहा – बालक! तू साफ-साफ सुन ले। राजा की गोद में तो केवल मेरा बच्चा ही बैठेगा। यह तेरा दुर्भाग्य है कि तू किसी और माता का पुत्र है। यदि तुझे राजसिंहासन चाहिए तो जा और परमपुरुष की आराधना करके उनसे यह वरदान माँग कि तू मेरा पुत्र होकर जन्म ले।  

सुरुचि की अप्रसन्नता के भय से राजा के मुख से प्रतिरोध का एक शब्द तक नहीं निकला। सौतेली माँ के कठोर वचनों और पिता की उदासीनता से ध्रुव को बहुत चोट लगी। वह रोता हुआ अपनी माता के पास आया। अपने पुत्र के मुख से सारी घटना का विवरण सुनकर सुनीति की आँखों में आँसू भर आए। उसने ध्रुव को कई तरह से ढाढस बंधाया और अंत में बोली – बेटा! तेरी सौतेली माँ ने एक बात तो ठीक ही कही है – यदि तुझे राजसिंहासन का सम्मान चाहिए तो तू भगवान की आराधना कर। उनके सिवा तेरा दुख और कोई नहीं दूर कर सकता। 

माता सुनीति के वचन सुनकर ध्रुव ने तत्काल राजधानी छोड़ दी और वन की ओर चल पड़ा। रास्ते में उसे नारदजी मिले। उन्हें ध्रुव के संकल्प को जान कर मन ही मन बहुत विस्मय हुआ – यह नन्हा बालक कितना स्वाभिमानी है! उन्होंने उसे समझाते हुए कहा – हे पुत्र! तू अभी से मान-अपमान के चक्कर में क्यों पड़ा है? मनुष्य को चाहिए कि वह सभी परिस्थितियों में अविचलित रहे। वह मनुष्य कभी दुखी नहीं होता जो अपने से अधिक गुणसंपन्न लोगों को देखकर प्रसन्न होता है, अपने समान गुण वालों से मैत्री का भाव रखता है और अपने से कम गुण वालों पर दया करता है।  तुमने अपने उद्देश्य की प्राप्ति के लिए जो मार्ग चुना है वह योगियों के लिए भी बहुत कठिन है। तुम अभी घर लौट जाओ। बड़े होने पर जब समय आए, तुम यह साधना कर लेना।

ध्रुव ने कहा- भगवन्! आपकी सारी बातें सत्य हैं। किंतु, इस समय मेरा हृदय मेरी विमाता के कठोर वचनों से भरा हुआ है। वहाँ आपके उपदेश प्रवेश नहीं कर सकेंगे। मुझे उस पद को पाना है जो आज तक कोई भी नहीं पा सका हो। मुझे आप वही मार्ग बताएँ।

ध्रुव की दृढ़ता के सामने नारदजी झुक गए। उन्होंने कहा – बेटा, तुम यमुना के तट पर जाओ, जहाँ अतीत में भगवान की कई लीलाएं हुई हैं। वहाँ तुम निरंतर ‘ओम्  नमो भगवते वासुदेवाय’ मन्त्र का जाप करते हुए भगवान का ध्यान करो। तुम्हारी संकल्प-सिद्धि का यही एक मार्ग है। 

नारदजी की बात सुनकर ध्रुव तपोवन की ओर चल पड़ा। उसके जाने के बाद नारदजी उत्तानपाद के महल में आ गए। वहाँ उन्होंने राजा को बहुत दुखी देखा। राजा बार-बार पश्चाताप कर रहा था कि क्यों उसने अपनी एक रानी के अधीन होकर ध्रुव और उसकी माता के प्रति इतना बड़ा अन्याय किया। पता नहीं, इस समय भूख-प्यास से व्याकुल वह छोटा-सा बालक वन में किस अवस्था में होगा! कहीं वह भेड़ियों का शिकार न बन गया हो!

नारदजी ने राजा को आश्वासन देते हुए कहा- राजन!आप उसकी चिंता न करें। स्वयं भगवान ही उसकी रक्षा करेंगे। 

उधर तपोवन पहुँच कर ध्रुव ने अपना कठिन तप आरंभ कर दिया। कुछ समय बीतने पर उसने आहार त्याग दिया और केवल जल पर निर्भर रहने लगा। फिर उसने जल लेना भी बंद कर दिया। अंत में, उसने अपनी सारी इन्द्रियों और मन को भगवान के साथ एकाकार करके अपनी साँसें भी रोक दीं। 

ध्रुव की तपस्या की ऐसी पराकाष्ठा देखकर सारी सृष्टि स्तब्ध रह गई। देवता घबराकर भगवान की शरण में गए और उनसे विनती करने लगे – हे प्रभु! न जाने कैसी अनहोनी हो गई है। ऐसा लगता है जैसे सारी सृष्टि के प्राण रुक गए हों। आप हमारी रक्षा करें!

भगवान ने कहा – आप सभी निश्चिंत रहें। यह हमारे महान भक्त ध्रुव की घनघोर तपस्या का प्रभाव है। अब वह समय आ गया है जब मैं उसे दर्शन दूँ। यह कहकर भगवान गरुड़ पर सवार होकर तपोवन पहुँचे जहाँ भक्त ध्रुव तपस्या में लीन था।  

भगवान ने ध्रुव को दर्शन देकर कहा – राजकुमार! मैं तुम्हारे हृदय का संकल्प जानता हूँ। इसलिए, मैं तुम्हें वह पद देता हूँ जो आज तक कोई नहीं पा सका है। मैं तुम्हें वह ध्रुव लोक देता हूँ जिसके चारों तरफ समस्त तारे और ग्रह परिक्रमा करते हैं। सृष्टि चाहे रहे या नष्ट हो जाए, यह ध्रुव-लोक सदा स्थिर रहेगा। पृथ्वी लोक में भी अपने पिता के बाद तुम्हारा शासन होगा जो हजारों वर्षों तक चलेगा। अंत में, तुम मेरे उस अविनाशी लोक में आ जाओगे जहाँ से फिर इस संसार में लौटना नहीं होता!

भगवान के प्रस्थान करने के बाद ध्रुव को एक विचित्र-सी उदासी ने घेर लिया। वह बार-बार यही सोचने लगा – मैं भी कितना मूढ़ हूँ! मैंने भगवान से अपने लिए मुक्ति क्यों नहीं माँगी? मैं उच्च पद, वैभव, यश जैसी तुच्छ वस्तुओं के लोभ में उलझ कर रह गया। मेरी स्थिति उस अभागे निर्धन व्यक्ति की तरह है जो सम्राट के सामने आकर भी अपने लिए केवल चावल के कुछ टूटे दाने ही माँगता हो!

इधर जब राजा उत्तानपाद को ध्रुव के वापस लौटने की सूचना मिली तो वह बहुत उत्साह से अपनी दोनों रानियों और पुत्र उत्तम के साथ उसके स्वागत के लिए चल पड़ा।ध्रुव को देखकर सबको बहुत प्रसन्नता हुई। सौतेली माता ने भी उसे प्यार से आलिंगन किया और लंबी आयु का आशीर्वाद दिया। उसके हृदय में ध्रुव के लिए अब कोई कटुता नहीं रह गई थी। इसमें कोई आश्चर्य की बात नहीं है, क्योंकि जिस प्रकार ढलान पर आते ही जल अनायास बहने लगता है, उसी प्रकार जिस पर भगवान  की कृपा हो गई हो, वैसे भक्त के आगे सबके मस्तक स्वयं ही झुकने लगते हैं! 

(मूल ग्रंथ श्रीमद्भागवत पुराण पर आधारित)

श्याम चतुर्वेदी 

(अगले अंक में – भक्ति की दुर्दशा एवं नारदजी का आगमन)

ध्रुव के राजधानी लौटने पर प्रजा, अमात्य-वर्ग और राजपरिवार के सभी सदस्य बहुत प्रसन्न हुए। समय आने पर राजा उत्तानपाद ने ध्रुव को राजसिंहासन सौंप दिया और तप के लिए वन को चला गया। 

एक दिन ध्रुव का सौतेला भाई उत्तम जब हिमालय क्षेत्र में शिकार कर रहा था, उसे एक बलवान यक्ष ने मार डाला। ध्रुव को जब यह समाचार मिला तो उसके क्रोध का ठिकाना न रहा। वह यक्षों से प्रतिशोध लेने के लिए उनकी नगरी अलकापुरी जा पहुँचा। वहाँ यक्षों से उसका घनघोर युद्ध हुआ जिसमें बड़ी संख्या में यक्ष मारे गए। 

ध्रुव के हाथों यक्षों के अविवेकपूर्ण संहार को देखकर उसके पितामह स्वायंभुव मनु को बहुत चिंता हुई। वे कई ऋषियों को साथ लेकर ध्रुव के पास पधारे और उससे कहा- हे पुत्र! अब अपने क्रोध पर लगाम दो। तुम्हारा अपने भाई के प्रति प्रेम समझ में आता है। किंतु, थोड़ा सोचो, उसे मारनेवाला एक ही यक्ष था। और, यहाँ तुमने उस एक के अपराध के लिए न जाने कितने निरपराध यक्षों को मार डाला है!

ध्रुव! तुमने तो अपने बचपन में ही परमेश्वर का साक्षात्कार कर लिया है। भगवान के ऐसे भक्त को यह क्रूरतापूर्ण आचरण शोभा नहीं देता। तुम्हारे इस कर्म से यक्षों के स्वामी कुबेर भी, जो भगवान शिव के सखा हैं, बहुत क्षुब्ध हैं। तुम उन्हें और क्रुद्ध मत करो। हमारे परिवार का कल्याण इसी में है कि तुम यह युद्ध बंद कर दो। 

मनु के इस तरह समझाने पर ध्रुव ने युद्ध रोक दिया। तब वहाँ कुबेर आए और ध्रुव को संबोधित करते हुए बोले  – पुत्र! मुझे प्रसन्नता है कि तुमने अपना वैर-भाव त्याग दिया। यदि ध्यान से देखा जाए तो तुम्हारे भाई अथवा अन्य यक्ष की मृत्यु काल-वश ही हुई है। अब तुम अपनी राजधानी लौट जाओ। भगवान तुम्हारा मंगल करें। हाँ,  जाने के पहले तुम्हारी जो इच्छा हो, तुम मुझसे वह वर माँग लो। 

ध्रुव ने कुबेर से यही वर माँगा कि उसे सदा भगवान की अखंड स्मृति बनी रहे। कुबेर वर देकर वहाँ से चले गए।  

(मूल ग्रंथ श्रीमद्भागवत पुराण पर आधारित)

श्याम चतुर्वेदी 

राजा ध्रुव के वंश में अङ्ग नामक एक राजा हुआ।  उसने एक बार अश्वमेध यज्ञ का अनुष्ठान किया। आश्चर्य की बात यह थी कि सारी पद्धतियों के ठीक होते हुए भी यज्ञ में दिए गए अपने भाग को ग्रहण करने के लिए देवता नहीं पधार रहे थे। ऐसा देखकर यज्ञ करा रहे ऋत्विजों ने राजा को सुझाव दिया – राजन! अपने पूर्व जन्म के एक अपराध के कारण आप इस जन्म में पुत्रहीन हैं। इसलिए, पहले आप पुत्र-प्राप्ति के लिए एक यज्ञ करें। इसमें आप भगवान विष्णु का आवाहन करें। जब भगवान विष्णु पधारेंगे तो सारे देवता भी स्वयमेव अपना भाग लेने आ जायेंगे। 

राजा ने वैसा ही किया। यज्ञ सफल रहा। समय आने पर राजा को एक पुत्र की प्राप्ति हुई। उसका नाम वेन रखा गया। 

कई बार किसी व्यक्ति के स्वभाव का उसकी आनुवांशिकता से कोई संबंध नहीं होता। ध्रुव और अङ्ग जैसे महान राजाओं के वंश में जन्मा वेन बचपन से ही बहुत क्रूर प्रकृति का था। खेल-खेल में निरपराध मनुष्यों और पशुओं का वध कर देने में उसे कोई हिचक नहीं होती थी। उसके पिता ने उसे सुधारने का बहुत प्रयास किया। किन्तु, वेन नहीं सुधरा। अंत में, निराश होकर राजा अङ्ग ने एक रात महल छोड़ दिया और वन को चला गया। राज्य के निवासियों ने राजा को बहुत ढूँढा, किन्तु वह कहीं नहीं मिला। उन्होंने अपनी समस्या मुनियों को बताई। 

भृगु आदि मुनियों ने यह देखा कि राजा के नहीं होने से सारे राज्य में अराजकता छा गई है। सर्वत्र दुष्टों का उपद्रव होने लगा है। तब सबने अन्य कोई विकल्प नहीं देखकर आपस में विचार कर वेन को ही राजसिंहासन पर बिठा दिया।  

राजसत्ता पाकर वेन की दुष्टता और बढ़ गई। वह राजधर्म भूल गया। उसने सभी मर्यादाओं को ताक पर रख दिया और जनता पर घोर अत्याचार करने लगा। 

वेन के अत्याचारों से जनता को दुखी देखकर मुनिजन पुनः एकत्र हुए। वे आपस में कहने लगे – जैसे दोनों छोरों पर जलती लकड़ी के बीच रहने वाले चींटी-जैसे जीव त्रस्त हो जाते हैं, उसी तरह राज्य की जनता भी अपराधियों और राजा वेन के अत्याचारों के बीच पिस रही है। हमने इस वेन को जनता की रक्षा के लिए नियुक्त किया था; आज यही दुष्ट वेन अपनी जनता के लिए सबसे बड़ा संकट बन गया है।  

यह सोचकर कि संभवतः वेन उनकी बात मान जाए, मुनिगण उसे समझाने के लिए उसके पास गए। उन्होंने कहा – राजन! राजा का सबसे बड़ा धर्म है – अपनी  प्रजा की रक्षा करना। जो राजा ऐसा करता है, उससे भगवान भी प्रसन्न रहते हैं। ऐसा राजा लोक और परलोक दोनों में सुख पाता है।

वेन अपने अहंकार में चूर था। उसने मुनियों का तिरस्कार करते हुए कहा – तुम लोग किस भगवान की बात कर रहे हो? विष्णु, ब्रह्मा, शिव और बाकी सारे देवता राजा के शरीर में होते हैं। मुझसे परे कोई सत्ता नहीं है। मैं सर्वदेवमय हूँ। सर्वत्र मैं ही मैं हूँ! तुम सभी केवल मेरी ही आराधना करो। 

वेन की अहंकार भरी बातों को सुनकर मुनियों के क्रोध का ठिकाना न रहा। उन्होंने एक स्वर में कहा  – मार डालो! इस अधर्मी, दुष्ट वेन को अभी मार डालो! यह यदि जीवित रह गया तो प्रजा नष्ट हो जाएगी। 

भगवान की निंदा करने के कारण वेन पहले ही मर चुका था। मुनियों ने अपने हुंकारों से उसका रहा-सहा जीवन भी समाप्त कर दिया। 

(शेष अगले अंक में)

(मूल ग्रंथ श्रीमद्भागवत पुराण पर आधारित)

श्याम चतुर्वेदी 

जब राजा वेन का अपनी प्रजा पर अत्याचार बहुत बढ़ गया तो मुनियों ने लोकहित में उसे मार डाला। फिर मुनिगण अपने-अपने आश्रम लौट गए। इधर वेन की माता ने कुछ विचार कर उसका शरीर सुरक्षित रखा।

वेन की मृत्यु के बाद राज्य में एक बार फिर अराजकता फैल गई। प्रजा को अपराधियों ने सताना शुरू कर दिया। राज्य को कभी भी राजा के बिना नहीं रहना चाहिए – यह सोच कर मुनिगण राजधानी में आ गए। 

राजा वेन यद्यपि क्रूर और अधर्मी था, किन्तु वह विख्यात अंग वंश की परम्परा में था। यह विचार कर एक श्रेष्ठ उत्तराधिकारी पाने की संभावना से मुनियों ने वेन की भुजाओं का मंथन किया जिससे पृथु का जन्म हुआ।  समस्त देवताओं ने उसे कई तरह की विशेष शक्तियाँ दीं। 

पृथु के राज्याभिषेक के अवसर पर उसकी स्तुति करने के लिए सूत, मागध और वंदीजन सामने आए। उन्हें देख कर राजा पृथु ने हँसते हुए कहा – अभी तो मैंने कुछ किया भी नहीं है। आप भला हमारी किस बात के लिए स्तुति करेंगे? कोई भी स्वाभिमानी व्यक्ति न तो अपनी निंदा में न ही अपनी प्रशंसा में रुचि रखता है।

वंदीजनों ने कहा  – हे राजन! मुनियों की प्रेरणा से हम यह विश्वास करते हैं कि आप जनता की अपेक्षाओं पर खरा उतरेंगे। जैसे, सूर्य धरती से वाष्प के रूप में जल लेकर पुनः उसे वृष्टि के रूप में लौटा देता है, उसी प्रकार आप जनता से कर लेकर उसका उपयोग जनता के लिए ही करेंगे। आप न्यायप्रिय होंगे। अपराध नहीं करने पर आप अपने शत्रु के पुत्र को भी दंड नहीं देंगे और अपराध करने पर अपने पुत्र को भी दंडित करेंगे।  आपकी प्रजा आपसे उतना ही स्नेह करेगी जितना कोई अपने शरीर से करता है। 

(शेष अगले अंक में)

(मूल ग्रंथ श्रीमद्भागवत पुराण पर आधारित)

श्याम चतुर्वेदी 

जब पृथु राजा बना, उस समय सर्वत्र अकाल पड़ा हुआ था। जनता अन्न के अभाव में बहुत कष्ट में थी। जनता ने राजा से विनती की  – महाराज! जैसे कोटर में सुलगती आग समूचे पेड़ को जला डालती है, उसी तरह हमारे पेट की आग हमें भी समाप्त कर रही है। आप कृपया कुछ उपाय करें जिससे हमारे प्राण बचें। 

पृथु ने इस पर बहुत देर तक विचार किया। उसने पाया कि यह सारा संकट इसलिए है क्योंकि पृथ्वी ने अब अन्न और औषधियाँ देना बंद कर दिया है। पृथु ने क्रोध में भरकर समस्त पृथ्वी को खोद डालने का निश्चय किया। 

तब पृथ्वी ने राजा से निवेदन किया  – हे राजन! बिना कारण जाने आपका मुझ पर क्रोध करना उचित नहीं है। वस्तुतः जब राजाओं ने मेरा पालन और आदर करना छोड़ दिया तो सर्वत्र दुराचारी लोगों की संख्या बढ़ गई। मेरे द्वारा दिए गए अन्न को खाकर ये दुराचारी बल में बढ़ते चले गए। मैं अपने अन्न से उन्हें और बलशाली नहीं बनाना चाहती थी। इसलिए, मैंने अन्न और औषधियों को अपने भीतर छिपा लिया। 

पृथ्वी ने फिर राजा पृथु को दो उपाय बताए –  एक, आप योग्य बछड़ा, पात्र और दुहनेवाले की व्यवस्था करें। मेरा दोहन कर सबको अपनी मनचाही वस्तु मिल जाएगी। दूसरे, आप मुझको समतल करें जिससे मेरे ऊपर वर्षा ऋतु के बाद भी जल ठहरा रहे और मेरी भीतरी आर्द्रता बनी रहे।

पृथ्वी की बात सुनकर पृथु ने मनु को बछड़ा और अपने दोनों हाथों को पात्र बनाकर सारे धान्य और औषधियों का दोहन किया। ऋषिगण ने वृहस्पति को बछड़ा बनाकर अपने इन्द्रियरूपी पात्र में समस्त ज्ञान-विज्ञान का दोहन किया। देवताओं ने इन्द्र को बछड़ा बनाकर सोने के पात्र में अमृत, ओज, बल का दोहन किया। दैत्यों ने प्रह्लाद को बछड़ा बनाकर लोहे के पात्र में मदिरा एवं अन्य नशीले पदार्थों का दोहन किया। गंधर्वों और अप्सराओं ने विश्वावसु को बछड़ा बनाकर कमल रूपी पात्र में संगीत एवं सौंदर्य का दोहन किया। इसी तरह, अपने-अपने लिए साँप, बिच्छू आदि प्राणियों ने विष, शाकाहारी पशुओं ने घास, मांसाहारी पशुओं ने कच्चा मांस, वृक्षों ने रस, पर्वतों ने विभिन्न धातुओं का दोहन किया। 

फिर पृथु ने परिश्रम कर पहाड़ों को तोड़ कर पृथ्वी को समतल बनाया। इन स्थानों पर उसने गाँव, नगर, दुर्ग बनाए और लोगों को बसाया। इसके पहले, लोगों के बसने की कोई निश्चित जगह नहीं होती थी। पृथु के प्रयास से अब जनता ज्यादा व्यवस्थित जीवन जीने लगी। 

(मूल ग्रंथ श्रीमद्भागवत पुराण पर आधारित)

श्याम चतुर्वेदी 

राजा पृथु ने सौ यज्ञ करने का संकल्प लिया। देवताओं के राजा इंद्र को यह जानकर बहुत चिंता हुई  – सौ यज्ञ करके तो पृथु मुझसे भी आगे बढ़ जाएगा…!

इंद्र किसी भी तरह पृथु को रोकने की चेष्टा करने लगा। जब पृथु ने निन्यानबे यज्ञ सफलतापूर्वक संपन्न कर अंतिम यज्ञ आरंभ किया तो इंद्र ने उसके यज्ञ का घोड़ा चुरा लिया। उस समय उसने एक साधु का वेश बनाया हुआ था।

मुनि अत्रि के द्वारा सूचित करने पर पृथु के पुत्र ने इंद्र का पीछा किया,  किंतु उसे साधु वेश में देखकर वह भी भ्रमित हो गया। अत्रि मुनि ने जब उसे वास्तविकता बताई तो उसने इंद्र के ऊपर आक्रमण किया। भयभीत इंद्र बीच में ही घोड़े को छोड़कर भाग गया। 

पृथु-पुत्र घोड़े को लेकर यज्ञशाला पहुँचा। इंद्र ने फिर एक बार कपट का सहारा लिया। उसने यज्ञशाला में सर्वत्र अंधकार फैला दिया और अंधकार की ओट में घोड़े को चुराकर भाग चला। इस बार भी उसने एक साधु का वेश बनाया हुआ था। मुनि अत्रि ने फिर पृथु के पुत्र  को वास्तविकता बताई। उसके द्वारा पीछा किए जाने पर इंद्र ने घोड़ा छोड़ दिया।  

इन्द्र के इस नीच आचरण को देखकर पृथु को उस  पर  बहुत क्रोध आया। उसने अपने धनुष पर बाण चढ़ाया और उसे मारने आगे बढ़ा। यह देखकर उसके यज्ञ के पुरोहितों ने कहा – हे राजन! आप यदि यज्ञ के बीच  में किसी का वध करेंगे तो  यह यज्ञ असफल हो जाएगा।  आप यह काम हमलोगों पर छोड़ दें। हम अपने मंत्रों की शक्ति से इंद्र को यहाँ खींचकर उसको यहीं अग्नि में हवन कर देंगे। वैसे भी, वह आपसे ईर्ष्यावश नीच कर्म करने के कारण लगभग मर ही चुका है। 

इसके बाद पुरोहितों ने मंत्र द्वारा इंद्र का आवाहन किया।वे उसे यज्ञ की अग्नि में डालना ही चाहते थे कि वहाँ ब्रह्मा प्रकट हुए। 

ब्रह्मा ने पृथु से कहा – हे राजन! आप सौवां यज्ञ करने का विचार छोड़ दें। इंद्र बार-बार इस यज्ञ में विघ्न डालने का प्रयास करता रहेगा। वह प्रत्येक बार धार्मिक वेश के पाखंड का सहारा लेगा। और, यह सब देखकर जनता में भी धार्मिक लोगों के प्रति भ्रम और अनादर बढ़ेगा। आप और इंद्र दोनों ही भगवान के अंश हैं। आप दोनों की सत्ता का एक विशेष उद्देश्य है। आप चाहे सौ यज्ञ न करें, तो भी आपकी महानता में कोई अन्तर नहीं पड़ता।  

विधाता की यही इच्छा है, यह विचार कर पृथु ने सौवां यज्ञ नहीं किया।  

[राजा पृथु उचित रास्ते पर था। इंद्र ने नीचता भरा काम किया, किंतु ब्रह्मा ने इंद्र का पक्ष लिया। 

 Life isn’t always fair!]

(मूल ग्रंथ श्रीमद्भागवत पुराण पर आधारित)

श्याम चतुर्वेदी

पृथु ने ब्रह्मा की बात मानकर सौवां यज्ञ करने का विचार छोड़ दिया। ( देखें – पिछला अंक – “तीस: पृथु के यज्ञ में इंद्र द्वारा व्यवधान”) जब इंद्र अपने अपराधों के लिए लज्जित होकर पृथु के चरणों पर गिरने लगा तो पृथु ने सब कुछ भुलाकर उसे क्षमा कर दिया। उसकी क्षमाशीलता की सबने बहुत प्रशंसा की। 

स्वयं भगवान विष्णु ने यज्ञ-स्थल पर प्रकट होकर पृथु को योग्य पात्र समझकर उस सत्य का उपदेश दिया जिसे जान लेने के बाद फिर किसी भौतिक सुख में आसक्ति नहीं रह जाती। भगवान बोले – राजन! आत्मा शरीर से भिन्न है।  यह कभी भी शरीर से संबंधित किसी सुख अथवा दुख से लिप्त नहीं होता। आत्मा के बारे में यह ज्ञान और इसके अनुसार आचरण ही परम शांति, ब्रह्म अथवा कैवल्य कहलाता है। 

पृथु! तुम राजा हो। तुम अपना राजधर्म निभाओ।  राजा का कल्याण उसकी प्रजा के कल्याण में ही है।   कल्याणकारी राजा को उसकी प्रजा के पुण्यों का छठा भाग मिलता है। इसके विपरीत, जो राजा प्रजा से केवल कर वसूलता है, किंतु उसकी रक्षा नहीं करता, उसका सारा पुण्य नष्ट हो जाता है और वह प्रजा के पाप का भागी बनता है।

राजन! तुम्हारी क्षमाशीलता और अन्य गुणों ने मुझे वश में कर लिया है। तुम मुझसे कोई वर माँगो। 

राजा पृथु ने भक्तिपूर्वक कहा – हे प्रभु! भौतिक सुखों की मुझे कोई चाह नहीं है। फिर भी, जिस प्रकार एक पिता अपनी संतान के बोले बिना भी उसका कल्याण करता है, आप भी वही करें जिसमें मेरा हित हो। 

भगवान ने प्रसन्नता से कहा – राजन! मुझमें तुम्हारी अटूट भक्ति बनी रहे। इस भक्ति के माध्यम से तुम मेरी दुस्तर माया को आसानी से पार कर लोगे। 

यह कहकर भगवान अंतर्धान हो गए। पृथु ने भी अपने नगर की ओर प्रस्थान किया। 

(मूल ग्रंथ श्रीमद्भागवत पुराण पर आधारित)

श्याम चतुर्वेदी 

पृथु के वंश में प्राचीनबर्हि नामक एक राजा हुआ।  उसकी कर्मकांड में बहुत रुचि थी। उसकी ऐसी अवस्था देखकर एक दिन नारद ने उससे कहा – राजन! तुम धर्म के वास्तविक स्वरूप को भूल गए हो। इन व्यर्थ के कर्मकांडों से तुम्हारा भला क्या कल्याण हो सकता है! तुमने धर्म के नाम पर यज्ञ में हजारों निरपराध पशुओं की बलि दी है। यह निर्दयता है; धर्म नहीं। मैं तुम्हें राजा पुरंजन की कथा सुनाता हूँ। 

नारद ने कहा- राजा पुरंजन एक बार अपने मित्र अविज्ञात के साथ घूमते-घूमते हिमालय के दक्षिण में पहुँचा जहाँ उसने नौ द्वारों वाला एक सुंदर नगर देखा। वहाँ उसे एक अत्यंत सुंदर स्त्री मिली जो अपने दस अंगरक्षकों के साथ चल रही थी। प्रत्येक अंगरक्षक की सौ-सौ पत्नियाँ थीं। एक पाँच फनों वाला साँप उस स्त्री की हर तरफ से रक्षा कर रहा था। 

उस स्त्री की सहमति से राजा ने उससे विवाह कर लिया और उसी नगर में रहने लगा। उस नगर में दो अंधे थे। राजा उनकी सलाह से ही अपने सारे काम करता था और जाता था।

समय के साथ पुरंजन की अपनी पत्नी में आसक्ति इतनी बढ़ गई कि वह उसके हाथ एक पालतू बंदर की तरह आचरण करने लगा। जब वह हँसती थी तो राजा भी हँसता था, जब वह उदास होती तो राजा भी उदास हो जाता, जब वह चलती तो राजा भी चलता, जब वह बैठती तो राजा भी बैठ जाता… 

एक दिन राजा की शिकार करने की बहुत इच्छा हुई। रानी को बिना बताए वह पाँच घोड़ों के रथ पर सवार होकर वन की ओर निकल पड़ा। उसने दिनभर में हजारों निर्दोष पशुओं को मार डाला। 

जब वह थका-हारा अपने महल पहुँचा तो रानी ने उससे मुँह फेर लिया। राजा ने बार-बार उससे अपने अपराध के लिए क्षमा माँगी। उसके मनाने पर रानी मान तो गई किंतु इसके बाद राजा पर उसका नियंत्रण और बढ़ गया।

( यह एक प्रतीकात्मक कहानी है जिसका अर्थ अगले अंक में खुलेगा।)

(मूल ग्रंथ श्रीमद्भागवत पुराण पर आधारित)

श्याम चतुर्वेदी 

(गतांक सेआगे)

(इस कहानी की पृष्ठभूमि के लिए “बत्तीस: राजा पुरंजन की कथा भाग-1″ पढ़ें)

नारद ने कहानी आगे बढ़ाई  –

राजा पुरंजन को अपनी रानी के साथ रहते कई वर्ष बीत गए। उनकी कई संतानें हुईं। अपने परिवार के मोह में वह इतना बंध गया कि उसे पता नहीं चला कि वह कब बूढ़ा हो गया। उधर, अपने राज-काज  पर ध्यान न देने के कारण उसके राज्य की शक्ति भी कम हो गई। 

जब गंधर्वराज चंडवेग ने राजा और उसके राज्य की यह अवस्था देखी तो उसने अपने 360 बलशाली गंधर्वों और उनकी उतनी ही गंधर्वियों के साथ उसके राज्य पर आक्रमण कर दिया। यह देखकर पाँच फनों वाला नगर- रक्षक साँप अपनी पूरी शक्ति से उनका सामना करने आगे बढ़ा। 

उन्हीं दिनों काल (समय) की कन्या जरा (शब्दार्थ  – वृद्धावस्था/बुढ़ापा) अपने वर की खोज में तीनों लोकों में भटक रही थी। उसने पहले नारद के सामने विवाह का प्रस्ताव किया। परन्तु, नारद आजीवन ब्रह्मचारी थे। उन्होंने जरा के प्रस्ताव को ठुकरा दिया। तब क्रोध में आकर जरा ने उन्हें श्राप दिया – तुमने मेरी प्रार्थना स्वीकार नहीं की। अतः तुम कभी एक स्थान पर अधिक देर ठहर नहीं सकोगे। 

नारद से निराश होकर जरा यवनराज भय के पास गई। भय ने उससे कहा –  तू मेरी बहन बन जा। फिर मैं तुम्हारे और अपने भाई प्रज्वार के साथ मिलकर अपनी विशाल सेना लेकर सारे लोकों में विचरुँगा। हमारी शक्ति को कोई न रोक पाएगा। जरा ने भय का प्रस्ताव स्वीकार कर लिया। फिर इन तीनों ने मिलकर राजा पुरंजन के नगर पर भयानक आक्रमण कर दिया। 

पुरंजन का नगर गंधर्वों और यवनराज के आक्रमण को झेल नहीं पाया। कई वर्षों तक उनसे युद्ध करने के कारण नगर-रक्षक साँप की शक्ति भी क्षीण हो गई थी।  “अब मैं इस नगर की और रक्षा नहीं कर सकता!”, यह सोच कर वह साँप दुख से रोने लगा। 

यवनराज भय ने राजा पुरंजन को बंदी बना लिया और उसे पशु की तरह बांध कर अपने साथ ले चला।  नगर-रक्षक साँप भी उसी के साथ हो लिया। देखते-ही-देखते पुरंजन का नगर नष्ट हो गया। 

अपनी मृत्यु आने तक राजा अपने बिना अपनी प्यारी स्त्री की दुर्दशा का विचार करता रहा। अगले जन्म में  उसने विदर्भराज की कन्या बनकर जन्म लिया। इस जन्म में उसका विवाह मलयध्वज नामक एक प्रतापी राजा से हुआ। मलयध्वज ने वर्षों तक शासन करने के बाद महल छोड़ दिया और तपस्या करते हुए अपने प्राण त्याग दिए।

अपने पति की मृत्यु से संतप्त होकर विदर्भराज की कन्या भी अपने प्राण त्यागने के लिए उद्यत हुई। तभी वहाँ एक ब्रह्मज्ञानी आया। उसने कहा – “क्या तुम्हें राजा पुरंजन वाला अपना पूर्व जन्म स्मरण नहीं है? मुझे देखो, मैं तुम्हारा वही अविज्ञात नामक मित्र हूँ, जिसे तुमने नगर के द्वार पर ही छोड़ दिया था।

“पहले मैं और तुम एक दूसरे के परम सखा थे। हम दो हंसों की तरह साथ-साथ सर्वत्र मुक्त विचरण करते थे। किंतु, विषय भोगों की लालसा में तुमने मेरा साथ छोड़ दिया और उस नगर में प्रवेश कर गए। फिर वहाँ की माया से ग्रस्त होकर तुम अपना वास्तविक स्वरूप भी भूल गए। 

“तुम इसको ठीक से समझो  – तुम न तो स्त्री हो न ही पुरुष। जो मैं हूँ (ईश्वर), वही तुम भी हो (जीव)। तुम्हारा वास्तविक स्वरूप यही है। अविद्या के कारण ही हमें स्त्री और पुरुष का, ईश्वर और जीव का भेद दिखाई पड़ता है।” 

इस प्रकार पुरंजन को आत्मज्ञान मिला। 

नारद की बातें सुनकर राजा प्राचीनबर्हि ने कहा- “भगवन्! इस कहानी का अर्थ  कृपया विस्तार से समझाएं।” 

नारद ने कहा – “राजन, राजा पुरंजन जीव का प्रतीक है। उसका सखा अविज्ञात ईश्वर है जो नाम-गुण से परे है। मानव देह वह नगर है जिसमें प्रवेश कर जीव सुख-दुःख भोगता है। इस नगर (देह) में नौ द्वार हैं – दो आँखें, दो नासिका-छिद्र, दो कान, मुख, लिंग, गुदा। पुरंजन की स्त्री बुद्धि का प्रतीक है। जीव अपनी बुद्धि के वश में होकर उसी की इच्छा-अनुसार सारे कर्म करता है।

“दस इन्द्रियाँ (पाँच ज्ञानेन्द्रियाँ, पाँच कर्मेन्द्रियाँ) उसके अंगरक्षक हैं। इन्द्रियों की वृत्तियाँ उनकी पत्नियाँ हैं। प्राण, अपान, व्यान, उदान, समानरूप पाँच वृत्तियों वाला प्राण ही नगर का रक्षक  साँप है।

“हाथ और पांव वे दो अंधे पुरुष हैं।  हाथों की सहायता से जीव अपने सारे काम करता है और अपने पैरों से कहीं भी आता-जाता है। 

“शरीर रथ है। पाँच इन्द्रियाँ उसके पाँच घोड़े हैं। पुण्य और पाप उसके दो पहिये हैं। इन्द्रियों के विषय उनके आयुध (हथियार) हैं। निर्दोष पशुओं का अंधाधुंध शिकार इन्द्रियों का अनियंत्रित व्यवहार है।  

“गंधर्वराज चंडवेग वास्तव में काल (समय) का प्रतीक है। 360 गन्धर्व* और 360 स्त्रियाँ* क्रमशः दिन और रात्रि हैं। (टिप्पणी अंत में देखें।)

“यवनराज मृत्यु का प्रतीक है। जरा वृद्धावस्था है जिसे कोई भी पसंद नहीं करता। प्रज्वार शीत और उष्म के दुख का प्रतीक है। जरा और  प्रज्वार दोनों मिलकर जीव को मृत्यु की ओर धकेलते हैं।

“जब तक मनुष्य अपने वास्तविक स्वरूप को नहीं पहचान लेता, तब तक वह कर्म-बंधनों में बंधा रहता है।  उसको दुख से कभी भी छुटकारा नहीं मिलता। यदि कभी ऐसा प्रतीत हो कि उसे किसी दुख से तात्कालिक  छुटकारा मिला, तो वह भी ऐसा ही है जैसे सिर पर का भारी बोझ हटा कर कंधे पर रख दिया गया हो।”

नारद की बातें सुनकर राजा प्राचीनबर्हि ने कर्मकांड छोड़ कर भगवान की भक्ति में अपना जीवन समर्पित कर दिया। 

*टिप्पणी: कुछ लोगों को यह जिज्ञासा हो सकती है कि 360 क्यों, 365 क्यों नहीं? तो इसका उत्तर ChatGPT ने यह दिया –

भारतीय (पारंपरिक) कैलेंडर में 360 दिनों के वर्ष की अवधारणा प्रतीकात्मक, खगोलीय और गणितीय है; यह वास्तविक सौर वर्ष (लगभग 365¼ दिन) का खंडन नहीं करती। आइए इसे चरणबद्ध रूप में स्पष्ट करें।

1. सबसे पहले, एक महत्वपूर्ण स्पष्टीकरण

भारत कभी भी 365¼ दिनों के सौर वर्ष से अनभिज्ञ नहीं रहा है।

प्राचीन भारतीय खगोलविद भली-भाँति जानते थे कि—

सौर वर्ष ≈ 365.2422 दिन

चंद्र वर्ष ≈ 354 दिन

वेदाङ्ग ज्योतिष, सूर्य सिद्धांत तथा बाद के अन्य सिद्धान्तिक ग्रंथ इन मानों और अधिक मास (intercalation) की व्यवस्था पर स्पष्ट रूप से चर्चा करते हैं।

तो फिर 360 कहाँ से आया?

2. 360 एक वैचारिक (आदर्श) वर्ष है, न कि नागरिक (कैलेंडरी) वर्ष

(क) 360 आदर्श सौर वृत्त है

एक वृत्त = 360 अंश (डिग्री)

सूर्य एक वर्ष में एक पूर्ण वृत्त की परिक्रमा करता है

अतः—

1 दिन ≈ सौर गति का 1 अंश (आदर्शीकृत)

इससे—

12 महीने × 30 दिन = 360 दिन

प्रत्येक महीना = सौर गति के 30 अंश

यह खगोलीय अमूर्तन (abstraction) है, न कि कैलेंडर की जिद।

3. गणितीय दृष्टि से 360 को प्राथमिकता क्यों

(क) 360 एक अत्यधिक संयोज्य संख्या (highly composite number) है।

यह साफ़-साफ़ विभाजित हो जाती है:

2, 3, 4, 5, 6, 8, 9, 10, 12 आदि से।

इससे आधुनिक गणित के विकास से पहले—

तिथियों,

नक्षत्रों,

योगों,

ग्रहों की गति

की गणनाएँ कहीं अधिक सरल हो जाती थीं।

4. वैदिक समय-इकाइयों में 360

कई वैदिक समय-प्रतिमान नागरिक नहीं, बल्कि अनुष्ठानिक–ब्रह्माण्डीय थे:

360 दिन → प्रतीकात्मक वर्ष

360 अस्थियाँ (वेदों में अनुष्ठानिक प्रतीकवाद)

अग्निचयन में वेदी-निर्माण की 360 ईंटें

वर्ष को एक ब्रह्माण्डीय शरीर की तरह देखा गया, न कि केवल कैलेंडर के पन्ने की तरह।

5. वास्तविक कैलेंडरों ने अंतर की भरपाई की

क्योंकि 360 ≠ 365, इसलिए भारतीय प्रणालियों ने इस अंतर को कभी नज़रअंदाज़ नहीं किया।

उपयोग में लाई गई सुधार विधियाँ—

अधिक मास

निश्चित तिथियों के बजाय तिथियों के माध्यम से समायोजन

अलग-अलग गणना—

सौरमान (सौर वर्ष)

चान्द्रमान (चंद्र वर्ष)

अतः—

360 ढाँचा था; समायोजन वास्तविकता।

6. अन्य सभ्यताओं से तुलना

भारत अकेला नहीं था।

बेबीलोनियन → 360-दिवसीय आदर्श वर्ष

प्राचीन मिस्र → 360 + 5 अतिरिक्त (epagomenal) दिन

मायन सभ्यता → 360-दिवसीय टुन (अनुष्ठानिक वर्ष)

क्यों?

क्योंकि खगोलशास्त्र की शुरुआत कैलेंडरों से नहीं, ज्यामिति से हुई थी।

7. एक वाक्य में

भारतीय परंपरा में 360-दिवसीय वर्ष सूर्य की गति का एक गणितीय–ब्रह्माण्डीय मॉडल है, न कि वर्ष की वास्तविक अवधि के बारे में कोई दावा।

(मूल ग्रंथ श्रीमद्भागवत पुराण, चतुर्थ स्कंध: अध्याय 25-29 पर आधारित)

श्याम चतुर्वेदी 

स्वायंभुव मनु के दो पुत्र थे – उत्तानपाद और प्रियव्रत।प्रियव्रत सर्वगुण-संपन्न था। उसके पिता ने उसे योग्य समझकर पृथ्वी के शासन करने का आदेश दिया। किन्तु, प्रियव्रत ने अपने-आपको भगवान वासुदेव के चरणों में समर्पित कर दिया था। उसे राज्य का तनिक भी लोभ नहीं था। ‘कहीं मैं राज्य मिलने पर भगवान की भक्ति छोड़ कर व्यर्थ के सांसारिक प्रपंचों में न पड़ जाऊँ’, ऐसा विचारकर उसने अपने पिता की आज्ञा नहीं मानी।

यह देखकर कि संसार और प्रियव्रत के हित में यही है कि प्रियव्रत पहले अपने सांसारिक कर्तव्यों का पालन करे, फिर वैराग्य का मार्ग चुने, ब्रह्मा अपने पार्षदों के साथ प्रियव्रत के पास पहुँचे। उन्होंने उसे समझाते हुए कहा – पुत्र, ईश्वर का विधान है कि मनुष्य अपने शरीर के माध्यम से पहले अपने कर्मों का फल – सुख-दुख भोगे। इसकी अवज्ञा मत करो। जो बुद्धिमान पुरुष अपनी इन्द्रियों को जीत चुका है और अपनी आत्मा में ही रमण करता है, उसका गृहस्थ-जीवन भला क्या बिगाड़ सकता है? जैसे, किले में सुरक्षित रहकर लड़ने वाला राजा अपने प्रबल शत्रुओं को जीत लेता है, उसी तरह जिसे छह शत्रुओं (मन और पाँच इंद्रियाँ) को जीतने की इच्छा है, वह घर में रहकर ही इन पर विजय पाए। यद्यपि तुमने अपने-आपको भगवान की भक्ति-रूपी किले में सुरक्षित कर लिया है, और, इन छह शत्रुओं को जीत भी लिया है, तथापि तुम भगवान के दिए गए कर्मफल भोगो। फिर अपना कर्मफल समाप्त हो जाने पर तुम अपने आत्म- स्वरूप में स्थित हो जाना।

राजा प्रियव्रत ने ब्रह्मा की आज्ञा मान ली और शासन करने लगा।

एक बार उसने यह सोचा कि सूर्य एक बार में केवल पृथ्वी के आधे भाग में ही प्रकाश करता है; उसका आधा भाग अंधकार में रहता है। ‘मैं रात को भी दिन बना दूँगा’ – ऐसा संकल्प लेकर उसने अपने रथ पर सूर्य के पीछे-पीछे चलते हुए पृथ्वी की सात बार परिक्रमा कर डाली। वह दूसरे सूर्य की तरह ही प्रकाशमान था। उसके रथ के पहियों की लीक से सात समुद्रों और सात द्वीपों की सीमा रेखा खींची गई।

इतने अलौकिक कर्म करते हुए भी प्रियव्रत का मन विषय-वासनाओं से मुक्त था। समय आने पर उसने अपने पुत्रों को विभिन्न द्वीपों का शासन सौंप दिया और स्वयं तप करने वन में चला गया।

(मूल ग्रंथ श्रीमद्भागवत पुराण, पंचम स्कंध: अध्याय 1 पर आधारित)

श्याम चतुर्वेदी

प्रियव्रत के वंश में राजा आग्नीध के नौ पुत्र हुए।  उनमें से एक का नाम नाभि था। नाभि बहुत प्रजावत्सल और प्रतापी राजा था। दुर्भाग्यवश, उसकी कोई संतान नहीं थी। उसने अपनी पत्नी मेरुदेवी के साथ संतान प्राप्ति के लिए यज्ञ किया। पति-पत्नी की श्रद्धा और भक्ति को देख कर उन्हें वर देने के लिए भगवान अपने चतुर्भुज रूप में उनके सामने प्रकट हुए।  

यज्ञ में उपस्थित ऋत्विजों ने भगवान की स्तुति की और कहा – प्रभो! आपसे हम यही वर माँगते हैं कि गिरने, ठोकर खाने, छींकने, जंभाई लेने, संकट के समय, ज्वर अथवा जीवन के अंतिम क्षणों में भी हम आपके नाम का स्मरण कर सकें। 

उन्होंने आगे कहा  – हे प्रभो! आपसे हमारी एक और प्रार्थना है। आप परम परमेश्वर हैं। इसलिए, आपके लिए ऐसी कोई वस्तु नहीं है, जो आप दे न सकें। किन्तु, जैसे एक अल्पबुद्धि कंगाल व्यक्ति किसी धनी दाता के सामने आकर भी उससे कोई बहुमूल्य वस्तु न माँग कर भूसा माँगे, उसी तरह हमारे यजमान नाभि भी आपसे एक बहुत तुच्छ वस्तु चाहते हैं। उनकी कोई संतान नहीं है। उनकी यही अभिलाषा है कि उन्हें आपके समान गुणों वाला एक पुत्र मिले। हम और क्या कहें, निस्संदेह यह आपकी माया का ही प्रभाव है कि आपको साक्षात देख कर भी नाभि की बुद्धि सन्तान-प्राप्ति से परे कुछ सोच नहीं पा रही है। आप जैसे सर्वशक्तिमान परमेश्वर से हम ऐसी तुच्छ वस्तु माँग रहे हैं, इसके लिए आप हमें क्षमा करें। 

भगवान बोले  – ऋषियो! आपने हमसे एक असंभव वर माँगा है। क्योंकि, मेरे समान तो बस मैं ही हूँ; दूसरा कोई नहीं। फिर भी, आपलोगों की तपस्या व्यर्थ न होगी। मैं स्वयं ही अपने अंश से नाभि के यहाँ अवतार लूँगा। 

समय आने पर भगवान ने ऋषभदेव के रूप में नाभि की रानी मेरुदेवी के गर्भ से जन्म लिया। उनके बड़े होने पर राजा नाभि ने उन्हें राज्य का भार सौंप दिया और अपनी पत्नी के साथ बदरिकाश्रम की ओर प्रस्थान किया।  

ऋषभदेव ने संसार को आदर्श गृहस्थ जीवन की शिक्षा देने के लिए स्वयं गृहस्थ जीवनअपनाया। महापुरुष जैसा आचरण करते हैं, सामान्य लोग उसी का अनुकरण करते हैं। उन्होंने इंद्र की कन्या जयन्ती से विवाह किया।  उनके सौ गुणवान पुत्र हुए। उनमें सबसे बड़े पुत्र का नाम भरत था। बाद में इन्हीं भरत के नाम पर उस भूमि का, जिस पर उनका शासन था, ‘भारतवर्ष ‘ नाम पड़ा।

(मूल ग्रंथ श्रीमद्भागवत पुराण, पंचम स्कंध: द्वितीय अध्याय पर आधारित)

श्याम  चतुर्वेदी 

एक बार ऋषभदेव ने अपनी प्रजा के कल्याण के लिए सबके सामने अपने पुत्रों को शिक्षा देते हुए कहा – पुत्रों! यह मनुष्य-शरीर विषयभोगों के लिए नहीं होना चाहिए। इन्द्रियों के भोग तो पशुओं को भी मिलते हैं। जब तक मनुष्य अपनी इन्द्रियों के विषयों में लिप्त रहता है, उसके दुख का अंत नहीं हो सकता। वह जन्म-मृत्यु के चक्र में पड़ा रहता है। बुद्धिमान मनुष्य को चाहिए कि वह भगवान के निरंतर ध्यान-मनन से, सांसारिक विषयों में वैराग्य की भावना से, सकाम कर्म छोड़कर निष्काम भक्ति से, सर्वत्र भगवान की ही सत्ता देखने के अभ्यास से अपने सांसारिक बंधन काट डाले।

पुत्रों! महापुरुषों की सेवा करो। यही मुक्ति का द्वार है। महापुरुष वे हैं जो समानचित्त, परमशान्त, क्रोधहीन, सबके शुभचिंतक और सदाचार संपन्न हैं। वृक्ष श्रेष्ठ हैं। वृक्षों से पशु श्रेष्ठ हैं। पशुओं से मनुष्य, मनुष्यों से गंधर्व, गंधर्वों से किन्नर, किन्नरों से असुर और असुरों से देवता श्रेष्ठ हैं। रुद्र देवताओं में श्रेष्ठ हैं। क्योंकि रुद्र की उत्पत्ति ब्रह्मा से हुई है, इसलिए ब्रह्मा उनसे श्रेष्ठ हैं। ब्रह्मा की उत्पत्ति मुझसे हुई है, इसलिए मैं उनसे श्रेष्ठ हूँ। किन्तु, मुझसे भी श्रेष्ठ वे महापुरुष हैं, जिनमें ये आठ गुण पाए जाते हैं  – सत्त्वगुण, शम, दम, सत्य, दया, तप, तितीक्षा (सहनशीलता) और ज्ञान। 

ऋषभदेव के सौ पुत्रों में भरत सबसे बड़े थे। उन्हें योग्य समझकर ऋषभदेव ने उन्हें राजगद्दी सौंप दी और स्वयं अवधूत बनकर महल से निकल पड़े। मान-अपमान, सुख-दुख से विरक्त ऋषभदेव के पास सारी सिद्धियाँ जैसे, आकाश-गमन, मन की गति से इच्छा मात्र से ही कहीं भी पहुँच जाना, अंतर्धान हो जाना, परकाया प्रवेश, दूर की बातें देखने-सुनने की क्षमता अपने-आप आ गईं। किन्तु ऋषभदेव ने उन्हें ग्रहण नहीं किया।  

राजा परीक्षित ने पूछा – भगवान ऋषभदेव तो जितेन्द्रिय थे। सिद्धियों से उनमें किसी तरह के विकार की कोई सम्भावना भी नहीं थी, फिर उन्होंने सिद्धियों को स्वीकार क्यों नहीं किया?

शुकदेव बोले – राजन, आपका कहना ठीक है। किन्तु,  चालाक शिकारी अपनी जाल में फँसे पशु का विश्वास नहीं करता (क्योंकि हो सकता है, पशु असहाय हो जाने या मरने का नाटक कर रहा हो)। अवसर पाते ही शिकारी की जरा-सी असावधानी से पशु उसकी जाल से निकलकर भाग सकता है। उसी प्रकार, बुद्धिमान पुरुष भी कभी अपने मन का विश्वास नहीं करता। मन पर पकड़ ढीली होते ही मन भाग जाता है और काम, क्रोध, लोभ, मोह, मद, भय आदि शत्रुओं को विनाश का अवसर दे देता है।

(मूल ग्रंथ श्रीमद्भागवत पुराण, पंचम स्कंध: द्वितीय-तृतीय अध्याय पर आधारित)

श्याम चतुर्वेदी 

राजा भरत भगवान के बहुत बड़े भक्त थे। उन्होंने कई वर्षों तक अपनी प्रजा का पालन किया और फिर अपने पुत्रों में राज्य बांट कर स्वयं पुलह-आश्रम, जो गंडकी नदी के किनारे स्थित है, चले गए। वहाँ उन्होंने एकाग्रता के साथ भगवान की आराधना में अपनी सारी शक्ति लगा दी।  

एक दिन भरत जब गंडक के किनारे बैठ कर जप कर रहे थे, वहाँ प्यास से व्याकुल एक हिरणी आई। उसने अभी जल पीना आरंभ ही किया था कि उसे पास ही किसी सिंह की भयानक गर्जना सुनाई दी। इससे घबराकर हिरणी ने नदी में छलांग लगा दी। हिरणी गर्भवती थी। भय और श्रम के प्रभाव से उसके गर्भ से उसका बच्चा निकल कर नदी में गिर गया और हिरणी की भी मृत्यु हो गई। 

ऐसा करुण दृश्य देख कर राजा भरत को बहुत दया आई। उन्होंने झटपट हिरणी के उस बच्चे को नदी से निकाला और उसे अपने साथ आश्रम ले आए। 

वह बच्चा धीरे-धीरे वहाँ आश्रम पर ही बड़ा होने लगा।  राजा भरत को उसकी बहुत चिंता रहती थी। उनका सारा समय अब उस हिरण के बच्चे के लिए खाना-पीना जुटाने, वन के पशुओं से उसकी रक्षा करने और उसकी बाल-सुलभ क्रीड़ा का आनंद लेने में बीतता था। 

समय बीतता गया। राजा भरत को पता ही नहीं चला कि कब उनके हृदय में अब तक विकसित हो रही वैराग्य की भावना को धकेल कर वहाँ हिरण के बच्चे के प्रति आसक्ति ने घर कर लिया। उनसे भगवत-जाप, यम- नियम आदि सारी साधना छूट गई। जिस भरत ने अपना सारा राजपाट, अपने सारे पुत्रों का मोह छोड़ दिया था,  उसी भरत को एक साधारण हिरण के बच्चे के स्नेह ने बाँध लिया! 

जब भरत की मृत्यु का समय आया तो वह हिरण- शावक उनके पास ही बैठा था। उनसे सदा के लिए वियोग की आशंका से वह उसी तरह शोकाकुल था जैसे एक पुत्र होता है। मेरे बाद इसका क्या होगा – यही चिंता करते हुए राजा भरत ने अपने प्राण त्याग दिए।

हिरणशावक के प्रति अंत समय तक इस घोर आसक्ति के कारण भरत को मुक्ति नहीं मिल पाई। उन्होंने अपनी मृत्यु के पश्चात एक हिरण के रूप में जन्म लिया। सौभाग्यवश उनकी अब तक की साधना के कारण इस जन्म में भी पिछले जन्म की स्मृति बनी रही।  उन्होंने निश्चय किया कि वह अब और किसी आसक्ति में नहीं बंधेंगे। उन्होंने अपना परिवार छोड़ दिया और शालग्राम तीर्थ पर चले गए। कहीं मैं फिर न बंध जाऊँ, इस आशंका से वह सदा अकेले रहते थे। समय आने पर उन्होंने अपना मृग-शरीर भी त्याग दिया। 

मृत्यु के बाद भरत का जन्म एक ब्राह्मण परिवार में हुआ। उनके पिता शम, दम, तप, स्वाध्याय, त्याग, अतिथि-सेवा, संतोष, धैर्य, विनय, विद्या, अनसूया( किसी में दोष नहीं देखना), आत्मज्ञान एवं आनंद आदि श्रेष्ठ गुणों से युक्त थे। 

भरत को अपने पूर्वजन्म की स्मृति थी। उनके पिता ने उन्हें शिक्षा देने का बहुत प्रयास किया, किंतु भरत अब दुबारा सांसारिक बंधनों में नहीं फंसना चाहते थे।  इसलिए, उन्होंने जानबूझकर मूर्ख होने का नाटक किया। 

(शेष अगले अंक में) 

(मूल ग्रंथ श्रीमद्भागवत पुराण, पंचम स्कंध: सप्तम- नवम अध्याय पर आधारित)

श्याम चतुर्वेदी 

भरत को शिक्षा देने का मनोरथ लिए ही एक दिन उनके पिता की मृत्यु हो गई। भरत सांसारिक जीवन में न फँस जाएँ, इसके लिए वह जान बूझ कर मूर्ख-जैसा आचरण करते थे। उनके भाई उन्हें सचमुच मूर्ख समझते थे। लोग उन्हें जडभरत कहने लगे। पिता की मृत्यु के बाद यह सोचकर कि भरत का कोई और उपयोग नहीं हो सकता, उनके भाइयों ने उनको खेती-बारी के काम में लगा दिया। भरत को इन बातों की कोई चिंता नहीं थी।  शारीरिक श्रम करने पर उन्हें जो भी रूखा-सूखा भोजन मिल जाता, उसी से अपना गुजारा कर लेते थे। मान-अपमान, सुख-दुख, स्वाद-अस्वाद, आदि का उन्हें कुछ भी ध्यान नहीं था, इस कारण उनका शरीर हृष्ट-पुष्ट था। 

किसी समय डाकुओं के एक सरदार ने पुत्र-प्राप्ति के लिए भद्रकाली को नर-बलि देने का संकल्प लिया। किंतु, दैववश जिस पुरुष को उसने बलि देने के लिए मँगाया था, वह उसकी कैद से निकल भागा। सरदार के सेवक उसकी खोज में हर तरफ भागे, किंतु उसका कहीं भी पता नहीं चला। तभी उनकी दृष्टि रात में वन्य-जीवों से खेत की रक्षा करते भरत पर पड़ी। भरत के दोषरहित शरीर को बलि के सर्वथा योग्य समझकर उन्होंने भरत को ही पकड़ लिया और उन्हें रस्सी से बाँधकर भद्रकाली के मंदिर में ले आए। 

उन डाकुओं ने अपनी परम्परा के अनुसार भरत को स्नान कराया, नए कपड़े पहनाए, चंदन का लेप लगाया, अच्छी तरह से भोजन कराया और भद्रकाली की मूर्ति के सामने उनका सिर झुकाकर बिठा दिया।  उसके बाद जोर-जोर से ढोल बजाकर, देवी की स्तुति करते हुए उनके पुरोहित ने भरत की गर्दन काटने के लिए तीक्ष्ण खड्ग उठाया। भरत बिना किसी भय के चुपचाप बैठे रहे।  

तभी एक चमत्कार हुआ। जब भद्रकाली ने डाकुओं  को इस कुकर्म के लिए उद्यत देखा तो वे क्रोध में भरकर तत्काल मूर्ति को तोड़ते हुए बाहर प्रकट हो गईं। उन्होंने सारे डाकुओं को उन्हीं की तलवार से मार डाला। भरत को मुक्ति मिली। सच है, जो महापुरुषों के प्रति अपराध करता है, उसका वही अपराध उसका भी नाश कर देता है !

भरत के बारे में एक अन्य कथा है। एक बार सिंधु-सौवीर देश का राजा रहूगण अपनी पालकी पर सवार होकर कहीं जा रहा था। रास्ते में भरत मिल गए। राजा के कहारों ने जब भरत के हृष्ट-पुष्ट शरीर को देखा तो उन्हें भी पालकी में जोत दिया। भरत ने इसका कोई विरोध नहीं किया और चुपचाप पालकी उठाकर चलने लगे। 

भरत के हृदय में जीवमात्र के प्रति करुणा थी। इस डर से कि उनके पैरों के नीचे दबकर कोई जीव मर न जाए, उन्हें बचाते हुए वे अपने पैरों को आगे-पीछे और दाहिने-बाएँ रखते हुए चलते थे। इससे राजा की पालकी भी ऊपर नीचे, आड़ी-तिरछी होने लगी। रहूगण ने जब इसका कारण पूछा तो उसके कहारों ने उत्तर दिया कि यह सब नए कहार (भरत) के कारण हो रहा है।  

यदि एक व्यक्ति में कोई दोष हो, और उसे सुधारा नहीं जाए तो वह अपने संपर्क में आने वाले अन्य लोगों को भी दूषित कर सकता है, यह सोच कर राजा ने भरत को सावधान किया। किन्तु, भरत ने उसका कोई उत्तर नहीं दिया और पहले की तरह ही चलते रहे।  तब राजा ने क्रोध से भरकर भरत को कहा – क्या तुम्हें मेरा थोड़ा- सा भी भय नहीं है? ठहर, मैं तेरी इस धृष्टता के लिए अभी दंड देता हूँ। 

जडभरत ने राजा की बात सुनकर मुस्कुरा कर कहा  – राजन! तुम्हारा सारा अभिमान केवल इस भेद-बुद्धि के कारण है कि तुम स्वयं को राजा समझते हो और हमें अपना सेवक। परमार्थ की दृष्टि से देखा जाए तो कौन राजा है और कौन सेवक? मैं देह और बुद्धि से परे हूँ। मुझे तो कहीं कोई भेद नहीं दिखाई देता। रही बात मुझे दंड देने की – तो, यदि मैं वास्तव में मूर्ख और प्रमादी हूँ, तो भी मुझे दंड देने का कोई लाभ नहीं होगा। जो स्वयं ही पिसा हुआ है, उसे और क्या पीसना!

यह कहकर भरत चुप हो गए और पहले की भांति पालकी अपने कंधे पर रखकर चलने लगे।  

राजा रहूगण के संस्कार अच्छे थे। भरत के वचनों का सत्य उसके हृदय को झकझोर गया।  ‘ यह कोई साधारण व्यक्ति नहीं हो सकता ‘ – यह सोचते हुए राजा तत्काल अपनी पालकी से उतर पड़ा और उसने भरत के पैर पकड़ लिए। रहूगण बोला  – देव! संसार से इस तरह अपने-आप को छुपा कर चलने वाले आप कौन हैं? आप कहीं दत्तात्रेय आदि अवधूतों में से एक तो नहीं हैं? आप कहीं साक्षात् भगवान कपिल तो नहीं? आप जो भी हों,  कृपया मुझे वह ज्ञान दीजिए जिसके मैं योग्य हूँ।  

भरत बोले – राजन! अपने मन को समझो। हमारा मन ही हमारी आसक्ति और मोक्ष दोनों का साधन होता है। विषयों में आसक्त मन दुख देता है, और विषयों से मुक्त हो जाने पर यही मन हमें परम पद दे देता है। जबतक दीपक में घी रहता है, उसकी बत्ती धुआँ और प्रकाश देती हुई जलती रहती है, और घी के समाप्त हो जाने पर उसकी अग्नि भी अग्नि तत्त्व में ही विलीन हो जाती है। ठीक इसी तरह, विषयों में आसक्ति समाप्त हो जाने पर मन भी अनंत सत्ता में लीन हो जाता है। 

(मूल ग्रंथ श्रीमद्भागवत पुराण, पंचम स्कंध पर आधारित)

श्याम चतुर्वेदी 

 राजा रहूगण ने कहा  – हे योगेश्वर! आपने परमतत्त्व के बारे में मुझे जो उपदेश दिए, उन्हें मैं नहीं समझ सका। कृपया आप उन्हें सरल शब्दों में समझाएँ। 

जडभरत बोले  – राजन! यदि गहराई से देखा जाए तो सब कुछ पृथ्वी से बना है। चाहे वह पत्थर हो अथवा कहार या पालकी या पालकी में बैठे हुए तुम  – सब कुछ पृथ्वी से ही उत्पन्न विभिन्न रूप हैं। काल आने पर इन सबको पुनः पृथ्वी में विलीन हो जाना है। किंतु तुम्हारी सीमित बुद्धि वर्तमान देह से परे कुछ देख नहीं पाती। इसी कारण तुम स्वयं को राजा समझते हो। एक तरफ तो तुम स्वयं को प्रजा का रक्षक बताते हो और दूसरी तरफ अपनी क्षणिक सुविधा के लिए इन बेचारे कहारों का शोषण करने में तुम्हें तनिक भी लाज नहीं आती। 

राजन! पृथ्वी भी अंतिम सत्य नहीं है। यह स्वयं कई परमाणुओं से मिलकर बनी है। दूसरी तरफ, परमाणुओं में भी काल और कर्म के अनुसार विकार होता है। इन सभी के पीछे एकमात्र परमात्मा की सत्ता ही परम सत्य है जिसमें कभी कोई विकार नहीं होता।

इसके बाद जडभरत ने राजा रहूगण को संसार के बारे में समझाते हुए कहा  – राजन! इस संसार को एक वन की तरह समझो। विभिन्न जीव इसमें व्यापरियों के समूह की तरह विचरण करते हैं। इस वन में एक तरफ तो अनेक प्रकार के हिंसक जंतु हैं, डाकू हैं और दूसरी तरफ सुख का भ्रम उत्पन्न करने वाला मायावी नगर भी है। सुख और लाभ की चाह लिए जीव निरंतर वन में भटकते रहते हैं। कभी प्यास लगने पर ये मृगतृष्णा की ओर भागते हैं, तो कभी धन की कमी होने पर आपस में ही  लड़ाई करने लगते हैं । किसी जीव ने बहुत परिश्रम करके अपने अच्छे कर्मों द्वारा जो धन अर्जित किया होता है, उसकी थोड़ी-सी असावधानी होते ही छह डाकुओं का समूह (मन और पाँच इन्द्रियाँ) उसका सबकुछ लूट लेता है। अपने परिवार के सदस्यों, मित्रों के कारण कभी जीव सुख पाता है, तो कभी ये लोग ही उसके दुख का कारण बन जाते हैं। इस भयानक संसार रूपी वन से मुक्ति पाने का एक ही रास्ता है  – भगवान के भक्तों की संगति करना।

इस तरह जडभरत के उपदेशों ने राजा रहूगण को परम तत्त्व की ओर बढ़ने को प्रेरित किया ।

(मूल ग्रंथ श्रीमद्भागवत पुराण, पंचम स्कंध, अध्याय 12-14 पर आधारित)

श्याम चतुर्वेदी

किसी समय कन्नौज नगरी में अजामिल नामक एक व्यक्ति रहता था। वह शास्त्रों का जानकार, सदाचारी, सबका हित चाहने वाला और सबका उपकार करने वाला था। किंतु, बाद में बुरी संगति में पड़कर उसने अपनी पत्नी का त्याग कर दिया एवं एक अन्य स्त्री के साथ रहने लगा। उसने उस स्त्री को प्रसन्न रखने के लिए अपनी समस्त पैतृक संपत्ति लुटा दी। यही नहीं, वह उसके लिए अन्यायपूर्ण, धर्म-निषिद्ध तरीकों से धन भी जुटाने लगा।

बिना सोचे-समझे यही सब करता वह एक दिन बूढ़ा हो गया। उसके जीवन का अंतिम दिन भी आ पहुँचा। उसने देखा कि उसे लेने के लिए भयानक यमदूत अपने हाथों में रस्सियाँ लिए उसके सामने आ गए हैं। अपनी मृत्यु को अचानक इस तरह अपने सामने देखकर उसने भय से व्याकुल होकर अपने बच्चे को जोर से पुकारा- “नारायण! नारायण!” उसके दस बच्चों में सबसे छोटे बच्चे का नाम नारायण था, जिसे वह सबसे अधिक प्रेम करता था।

भगवान के पार्षदों ने जब यह सुना कि अजामिल ने भगवान का नाम पुकारा है, तो वे अविलंब उसके सामने उपस्थित हो गए। उस समय यमदूत अजामिल के शरीर से उसके सूक्ष्म शरीर को खींच रहे थे। भगवान के पार्षदों ने यमदूतों को ऐसा करने से बलपूर्वक रोक दिया।

यमदूतों ने कहा – तुम लोग कौन हो और हमें हमारे काम में बाधा क्यों दे रहे हो? हम धर्मराज की आज्ञा से ही अजामिल के प्राण लेने आए हैं।

भगवान के पार्षदों ने हँसकर कहा – यदि ऐसा है कि तुम लोग धर्मराज की आज्ञा से यहाँ आए हो तो जरा हमें बताओ कि धर्म क्या है? और, धर्म के अनुसार दंड किसे दिया जाता है?

यमदूतों ने कहा – हमने सुना है, वेदों की आज्ञा के अनुसार कर्म करना धर्म है, और, वेदों के विरुद्ध कर्म करना अधर्म है; क्योंकि, वेद भगवान के साक्षात रूप हैं। इस लोक में प्राणी जैसा कर्म करता है, उसे परलोक में उतना और वैसा ही फल मिलता है। जब तक जीव काम, क्रोध, लोभ, मोह, मद, मत्सर – इन छह शत्रुओं पर विजय प्राप्त नहीं कर लेता, वह ऐसे कर्म करता रहता है जिससे वह जन्म-मृत्यु के जाल में फँसा रहता है। जैसे, रेशम का कीड़ा अपने ही बुने हुए जाल में फँसा रहता है, वैसे ही जीव भी अपने ही कर्मों के कारण जन्म-मृत्यु के चक्र में फँसा रहता है। यह अजामिल पहले बहुत अच्छा व्यक्ति था। किंतु, बाद में यह अच्छाई के मार्ग से भटक गया। इसे हम अपने स्वामी यमराज के पास ले जाएँगे। वहाँ यमलोक में यह अपने पापों का दंड भोगकर शुद्ध हो जाएगा।

भगवान के पार्षदों ने कहा – यमदूतो! जिस क्षण अजामिल ने ‘नारायण’ इन चार अक्षरों का उच्चारण किया, उसके समस्त पाप नष्ट हो गए। भगवान के नाम में ऐसी शक्ति है। इससे क्या अंतर पड़ता है कि किसी ने किस अभिप्राय से भगवान का नाम लिया? जाने-अनजाने जैसे भी ईंधन यदि अग्नि में पड़ जाए तो वह भस्म हो जाता है। कोई बिना जाने भी यदि अमृत पी ले तो वह अमर हो जाता है। इसी तरह, चाहे जिस अभिप्राय से भगवान का नाम लिया जाए, मनुष्य के सारे पाप उसी क्षण नष्ट हो जाते हैं।

यमदूतों ने भगवान के पार्षदों का कोई विरोध नहीं किया। वे यमलोक लौट गए और वहाँ यमराज को सारा वृत्तांत सुना दिया।

यमराज ने उनकी बात सुनकर कहा – दूतो! इसमें विस्मय की कोई बात नहीं है। मैं और मेरे सारे विधान भी उसी परम सत्ता के अधीन हैं जिसमें यह समस्त सृष्टि लय है। वही परम सत्ता ब्रह्मा, विष्णु, शंकर के रूप में इस जगत की उत्पत्ति, स्थिति तथा नाश करती है। भगवान के भक्तों के ऊपर मेरा विधान नहीं चलता। एक तो वे कोई पाप करते नहीं, दूसरे, उनसे यदि अज्ञानतावश कोई पाप हो भी जाए तो उनके द्वारा भगवान के नाम का गुणगान उसे तत्काल नष्ट कर देता है।

इधर मृत्यु के पाश से छूटा हुआ अजामिल जब तक कुछ समझ पाए, उसके पहले ही भगवान के पार्षद भी अंतर्धान हो गए। अजामिल बार-बार सोचने लगा – मैंने अभी-अभी जो अद्भुत दृश्य देखा, क्या वह स्वप्न था या कुछ और? जो भयानक यमदूत मुझे रस्सी से खींच रहे थे, वे कहाँ चले गए? मुझे मृत्यु के मुँह से वापस खींच लाने वाले हुए दिव्य पुरुष कौन थे?

उस एक क्षण में अजामिल के सामने उसका पूरा जीवन घूम गया। वह सोचने लगा – धिक्कार है मुझे! मैं धर्म के मार्ग से किस तरह भटक गया था! अपनी वासना की झोंक में मैंने अपनी सती और अबोध पत्नी का त्याग कर दिया। मेरे माँ-बाप बूढ़े थे। उनकी सेवा करने वाला मेरे सिवा कोई न था। मैंने उन्हें भी छोड़ दिया। परंतु अभी-अभी मैंने यह क्या अनुभव किया? भगवान के नाम के उच्चारण में इतनी शक्ति है! मैं अब कितना मुक्त अनुभव कर रहा हूँ! अब मैं पुनः संसार के बंधनों मे नहीं पड़ना चाहता।

अजामिल हरिद्वार चला गया। उसने वहाँ संपूर्ण एकाग्रता से भगवान की उपासना में अपने-आप को समर्पित कर दिया। उसकी बुद्धि मन और इंद्रियों के विषयों से मुक्त होकर केवल भगवान में रम गई। समय आने पर भगवान के वे ही पार्षद वहाँ आए और अजामिल को अपने साथ लेकर वैकुण्ठलोक चले गए।

(मूल ग्रंथ श्रीमद्भागवत पुराण, षष्ठ स्कंध पर आधारित)

श्याम चतुर्वेदी

ब्रह्मा ने अपनी मानसिक शक्ति से नौ प्रजापतियों की सृष्टि की। उनमें से एक का नाम दक्ष प्रजापति था। दक्ष के कई पुत्र हुए। उसने अपने पुत्रों को सृष्टि का और आगे विस्तार करने की आज्ञा दी।

दक्ष के पुत्रों ने पिता की आज्ञा मानकर अच्छी संतान की सृष्टि के उद्देश्य से तपस्या करने के लिए सिंधु-तट पर स्थित नारायण-सर तीर्थ की ओर प्रस्थान किया। अनेक महात्माओं के निवास एवं तप के कारण यह एक बहुत पवित्र तीर्थ था। वहाँ दक्ष के पुत्रों में तीर्थ के प्रभाव और अपनी तपस्या के कारण भगवान के प्रति अतीव भक्ति हो गई। किंतु, पिता की आज्ञावश वे संतान की इच्छा से तप करते रहे।

जब नारद ने उन्हें इस तरह तप करते देखा तो उनके सामने आकर उन्होंने एक पहेली में यह बात कही – जब तुम लोगों ने पृथ्वी का अंत ही नहीं देखा तो फिर सृष्टि क्या करोगे? देखो, एक ऐसा देश है जिसमें केवल एक ही पुरुष का निवास है। एक ऐसी सुरंग है जिससे बाहर निकलने का कोई रास्ता नहीं। एक ऐसी नदी है जो आगे-पीछे दोनों तरफ बहती है। एक हंस है जिसकी कथा बड़ी विचित्र है। तेज छूरों और वज्र से बना हुआ एक चक्र है जो अपने-आप घूमता रहता है। तुमने क्या अपने पिता के आदेश को ठीक से समझा है? जब तक तुम लोगों ने ये सारे रहस्य समझ नहीं लिए तुम भला किस तरह की सृष्टि करोगे?

दक्ष के पुत्र बहुत बुद्धिमान थे। उन्होंने आपस में विचार किया – नारद मुनि के गूढ वचनों का अभिप्राय क्या है? निश्चय ही यह शरीर पृथ्वी है जो जीव का कर्मक्षेत्र है। जब तक इस शरीर की सीमा (विनाशशीलता) का बोध नहीं हो जाए, तब तक सकाम कर्मों को करते रहने से क्या लाभ हो सकता है? संपूर्ण सृष्टि में बस एक ही पुरुष अर्थात्‌ ईश्वर ही तो है जो प्रत्येक जीव में और प्रत्येक कण में विद्यमान है। सुरंग का आशय वह मार्ग है जिससे चलकर जीव जब भगवान को पा लेता है तो वहाँ से वह पुनः नहीं लौटता। माया ही दोनों ओर बहने वाली नदी है। यही सृष्टि और संहार दोनों ओर प्रवाहित होती है। माया का ज्ञान हो जाए तो यह मुक्ति की ओर ले जाती है और माया यदि समझ में नहीं आए तो बंधन की ओर। हंस उस पुरुष का प्रतीक है जिसमें नीर-क्षीर विवेक है। निरंतर घूमता हुआ चक्र वस्तुतः कालचक्र है जिसके तीखे प्रहार से कोई नहीं बच सकता। नारद जी जिस पिता की ओर संकेत कर रहे हैं, वह वास्तव में उनके पिता दक्ष नहीं है। यहाँ शास्त्रों को पिता कहा गया है। और, शास्त्रों का आदेश कर्मों के बंधन में पड़ना नहीं बल्कि उनसे मुक्त होना है।

नारद के वचनों का ऐसा अर्थ लगाकर दक्ष के पुत्रों ने भौतिक संतान-उत्पत्ति का सारा विचार छोड़कर स्वयं को भगवान की भक्ति में समर्पित कर दिया।

जब दक्ष को इस बात का पता चला कि उसके शीलवान पुत्र नारद के उपदेश के कारण संतान-उत्पत्ति का विचार त्याग चुके हैं तो उसे बहुत दुख हुआ। उसने सोचा – कई बार अच्छी संतान का होना भी शोक का विषय हो जाता है!

ब्रह्मा ने दक्ष को सांत्वना दी। उनके समझाने-बुझाने पर दक्ष ने फिर अपने दूसरे पुत्रों को प्रजा-सृष्टि का आदेश दिया। ये पुत्र भी नारायण-सर गए और उन्होंने तप आरंभ कर दिया। नारद उनके पास आए और उन्हें भी वही बात सुनाई जो उनके भाइयों को सुनाई थी। नारद ने कहा – पुत्रो! तुम लोग भी अपने बड़े भाइयों के मार्ग का अनुसरण करो। दक्ष के इन पुत्रों ने भी वैसा ही किया।

यह समाचार पाकर दक्ष के क्रोध का ठिकाना नहीं रहा। उसने नारद को कहा – अरे दुष्ट! तुमने हमारे सारे बालकों को भिक्षुओं के मार्ग पर चलाकर बड़ा बुरा किया। अभी तो उन्हें ब्रह्मचर्य और गृहस्थ आश्रम के कई कर्म करने थे और समाज एवं परिवार के प्रति विभिन्न ऋण उतारने थे। उन्हें स्वयं विषयों को भोगकर उनकी नश्वरता को समझ कर वैराग्य लेना था। किंतु, तुमने उन्हें समझा-बुझाकर हठात् वैराग्य के मार्ग पर ठेल दिया। यदि हमारी सारी संतानें वैराग्य मार्ग ही अपना लें तो हमारी वंश-परंपरा नष्ट हो जाएगी। संसार की सृष्टि का क्या होगा? तुमने यह छोटी-सी बात क्यों नहीं समझी? मूढ़! मैं तुम्हें शाप देता हूँ – आज के बाद तुम किसी एक स्थान पर कभी ठहर नहीं सकोगे। तुम्हारा सारा जीवन संपूर्ण ब्रह्मांड में एक स्थान से दूसरे स्थान तक भ्रमण करते ही व्यतीत होगा!

नारद ने विनम्रतापूर्वक “बहुत अच्छा” कहकर दक्ष का शाप स्वीकार कर लिया। दक्ष को नारद भी शाप दे सकते थे, किंतु उन्होंने वैसा नहीं किया। प्रतिशोध लेने की क्षमता होते हुए भी जो दूसरों का अपकार सहन कर ले, वही सच्चा साधु है।

(मूल ग्रंथ श्रीमद्भागवत पुराण, षष्ठ स्कंध पर आधारित)

श्याम चतुर्वेदी

देवताओं के राजा इंद्र को अपनी सत्ता का बहुत घमंड हो गया था। उसने उचित-अनुचित का ध्यान करना छोड़ दिया था। एक दिन जब वह अपनी सभा में अपने दरबारियों के साथ बैठा हुआ अपनी प्रशंसा से भरे गीत सुनने में मग्न था, वहाँ देवताओं के गुरु बृहस्पति पधारे। बृहस्पति का सुर और असुर दोनों सम्मान करते थे। किंतु, उस दिन सत्ता के मद में चूर इंद्र ने अपने गुरु का न अभिवादन किया न ही उन्हें बैठने के लिए कोई आसन दिया। बृहस्पति ने समझ लिया कि इंद्र में सत्ता के ऐश्वर्य का दोष आ गया है। वे चुपचाप वहाँ से बाहर निकल आए।

बृहस्पति के जाने के बाद इंद्र को अपनी भूल का एहसास हुआ। उसने और सभी देवताओं ने अपने गुरु को बहुत ढूँढा, किंतु वे कहीं नहीं मिले। इधर जब असुरों को इंद्र और उसके गुरु बृहस्पति की अनबन का पता चला तो उन्होंने इसे उचित अवसर समझकर स्वर्ग पर आक्रमण कर दिया। देवताओं को उचित निर्देशन देने वाला कोई गुरु नहीं था। इसलिए युद्धभूमि में वे असुरों के सामने टिक नहीं पाए।

जब युद्ध में देवताओं की भारी क्षति होने लगी तो वे घबराकर ब्रह्मा की शरण में गए। ब्रह्मा ने उन्हें परामर्श दिया कि वे त्वष्टा के पुत्र विश्वरूप ऋषि के पास जाकर उन्हें अपना गुरु बनने की प्रार्थना करें। देवताओं ने विश्वरूप के आश्रम जाकर उनसे प्रार्थना की कि वे उनके गुरु बन जाएँ। विश्वरूप युवा थे और तपस्वी थे। उन्होंने देवताओं की कहानी सुनकर कहा – देवताओ! मैं तपस्वी हूँ। खेतों में फसल कट जाने पर अथवा अनाज की हाट उठ जाने पर भूमि पर जो थोड़े-बहुत दाने गिर जाते हैं, उन्हें चुनकर और खाकर मेरा काम चल जाता है। फिर मैं आप लोगों का गुरु क्यों बनूँ? राजसत्ता के साथ जुड़ते ही मनुष्य की सारी तपस्या क्षीण होने लगती है।

किंतु बाद में, देवताओं के बहुत अनुनय-विनय करने पर विश्वरूप ने उनकी प्रार्थना स्वीकार कर ली। उनके परामर्श के अनुसार युद्ध करने से देवताओं को असुरों के विरुद्ध युद्ध में विजय मिली।

विश्वरूप के पिता त्वष्टा आदित्य थे और उनकी माता असुर कुल की थीं। एक बार देवताओं का यज्ञ करते हुए विश्वरूप ने मातृ-स्नेह के कारण देवताओं के साथ-साथ असुरों को भी यज्ञ के पुण्य का भाग देना आरंभ कर दिया। इंद्र ने जब यह देखा कि इस तरह यज्ञ के पुण्य के प्रभाव से असुरों की शक्ति बढ़ जाएगी, तो उसने तत्काल विश्वरूप का सिर काट दिया।

विश्वरूप की इस तरह इंद्र के हाथों मृत्यु का समाचार पाते ही उनके पिता त्वष्टा के क्रोध का ठिकाना नहीं रहा। उन्होंने यज्ञ की अग्नि से वृत्रासुर नामक एक भयानक दैत्य प्रकट किया और उसे आदेश दिया – हे इंद्र के शत्रु! जाओ और अपने शत्रु को शीघ्रातिशीघ्र मार डालो!

वृत्रासुर अपने त्रिशूल को लहराता हुआ देवताओं की ओर चल पड़ा। उसे आते देख देवताओं ने उस पर अपने समस्त शस्त्रों का प्रयोग किया किंतु उसके ऊपर उनका कोई प्रभाव नहीं पड़ा।भयभीत देवताओं ने तब भगवान की शरण ली। भगवान ने उनकी यह अवस्था देखकर उनसे कहा – तुम लोगों का कल्याण हो! देवराज इंद्र! तुम ऋषि दधीचि के पास जाकर उनसे उनका शरीर माँगो। उपासना, व्रत और तपस्या के कारण उनके शरीर में अद्भुत शक्ति आ गई है। उनके शरीर की अस्थियों से विश्वकर्मा के द्वारा एक अस्त्र तैयार कर लो। इस अस्त्र से तुम वृत्रासुर को पराजित कर पाओगे।

ऋषि दधीचि का एक नाम ‘अश्वशिर’ भी है। इसके पीछे की कथा इस प्रकार है – एक बार अश्विनीकुमारों ने, जो देवताओं के वैद्य हैं, ऋषि दधीचि से ब्रह्मज्ञान देने की प्रार्थना की। दधीचि ने उन्हें यह कह कर लौटा दिया – मैं इस समय एक आवश्यक कार्य में व्यस्त हूँ। तुम लोग बाद में आना।

अश्विनीकुमारों के जाते ही इंद्र वहाँ आया।उसने ऋषि को कहा – अश्विनीकुमार वैद्य हैं। यदि आपने उन्हें ब्रह्मविद्या दी तो मैं आपका सिर काट डालूँगा।

इंद्र के जाने के कुछ समय बाद जब अश्विनीकुमार पुनः आए तो उन्हें दधीचि ने यह बात बताई। अश्विनीकुमारों ने कहा – आप चिंतित न हों। हमारे पास इसका एक उपाय है। हम पहले ही आपका सिर काटकर वहाँ एक घोड़े का सिर लगा देंगे। आप इस अश्व के मुख से हमें ब्रह्मज्ञान का उपदेश करें। आपके ऐसा करने पर इंद्र आपका घोड़े का सिर काट देगा। तब हम पुनः आपका असली सिर जोड़ देंगे।

दधीचि ने वैसा ही किया। इस प्रकार एक अश्व के सिर से उपदेश किए जाने के कारण ब्रह्म-विद्या का नाम ‘अश्वशिरा’ पड़ा।

भगवान की आज्ञा पाकर देवराज इंद्र समेत सारे देवता दधीचि के आश्रम पहुँचे। उन्होंने जब ऋषि से उनका शरीर माँगा तो दधीचि ने हँसते हुए कहा – आपने कभी यह सोचा नहीं कि किसी मनुष्य के लिए उसका अपना शरीर त्यागना कितना कठिन होता है। स्वयं भगवान भी यदि किसी से उसका शरीर माँगे तो भी कोई नहीं देना चाहेगा।

देवता बोले – ब्रह्मन्! इसमें कोई संदेह नहीं कि माँगने वाले लोग बहुत स्वार्थी होते हैं। वे कभी यह नहीं सोचते कि देने वाले को कितनी कठिनाई हो सकती है। यदि वे जानते तो कभी माँगते नहीं। इसी प्रकार, देने वाला भी माँगने वाले की विपत्ति को नहीं जानता। अगर वह जान पाता तो कभी भी अपने मुख से ‘नहीं’ नहीं कहता। हम पर घोर विपत्ति आ पड़ी है। आप कृपया अपना शरीर देकर हमारी रक्षा करें।

दधीचि ने हँसकर कहा – आप लोगों के मुख से धर्म की बातें सुनकर अच्छा लगा। सच तो यह है कि इस विनाशी शरीर का मुझे कभी मोह नहीं रहा। यह लो, मैं इसी समय अपना शरीर छोड़ देता हूँ।

ऋषि के शरीर की हड्डियों से देवताओं के कारीगर विश्वकर्मा ने कई अस्त्र-शस्त्र बनाए। उनमें से प्रमुख अस्त्र का नाम था – वज्र, जिसे इंद्र ने धारण किया। इन दिव्य अस्त्रों के बल पर देवताओं ने वृत्रासुर को पराजित किया।

(मूल ग्रंथ श्रीमद्भागवत पुराण पर आधारित)

श्याम चतुर्वेदी

विश्वकर्मा ने दधीचि की हड्डियों से वज्र बनाकर इंद्र को सौंप दिया। वज्र लेकर इंद्र अपने हाथी ऐरावत पर सवार होकर वृत्रासुर से युद्ध करने चला।

देवताओं और असुरों में घोर संग्राम हुआ। इस बार देवताओं को भगवान का आशीर्वाद और इंद्र को वज्र मिला था, इसलिए असुरों के पैर उखड़ने लगे। उनकी अवस्था इतनी खराब हो गई कि वे रण छोड़कर भागने लगे। अपने सैनिकों को इस तरह भागते देखकर वृत्रासुर में उन्हें ललकारते हुए कहा – भागो मत। मेरी बात सुनो – युद्ध में वीरतापूर्वक मृत्यु से सुयश और स्वर्ग दोनों मिलते हैं। परंतु असुरों पर वृत्रासुर की बातों का कोई प्रभाव नहीं पड़ा। वे अपने नेता को अकेला छोड़कर भाग चले।

तब वृत्रासुर ने देवताओं को संबोधित करते हुए कहा – देवताओ! युद्ध भूमि से भाग रहे इन कायर असुरों पर पीछे से अस्त्र प्रहार करते हो? इसी को तुम अपनी शूरवीरता कहते हो? देखो, मैं अभी तुम्हें बताता हूँ कि युद्ध क्या होता है! यह कहकर वृत्रासुर ने जोर से सिंहनाद किया और देवताओं के ऊपर प्रहार करना शुरू किया। देवता उसके प्रहार से मूर्च्छित होने लगे।

तब क्रोध में आकर इंद्र ने जब वृत्रासुर पर अपनी विशाल गदा चलाई तो उसने उसे खेल-खेल में ही पकड़ लिया और पलट कर इंद्र की ओर वही गदा चला दी। गदा के प्रहार से व्याकुल ऐरावत इंद्र के साथ ही कुछ हाथ पीछे चला गया। युद्ध-धर्म जानने वाले वृत्रासुर ने इंद्र पर तब तक प्रहार नहीं किया जब तक इंद्र वज्र लेकर पुनः युद्ध के लिए तैयार नहीं हो गया।

इंद्र को देखकर वृत्रासुर को अपने भाई की याद आ गई। उसने क्रोध से कहा – इंद्र! तुमने विश्वरूप की निर्दयता- पूर्वक हत्या करके तीन अपराध किये हैं – वह तपस्वी था, मेरा भाई था, और, तुम्हारे ऊपर विश्वास करने वाला तुम्हारा गुरु भी था। उसे मारते हुए तुम्हें न तो दया आई न ही लज्जा! आज मैं तुझे तेरे अपराधों का दंड देता हूँ। तुझ जैसे नीच का साथ देने वाले ये सारे देवता भी आज मेरे द्वारा यहीं मारे जाएँगे।

फिर कुछ सोच कर वृत्रासुर ने कहा – इंद्र! मैं तेरे सामने खड़ा हूँ। तू मुझ पर अपना अमोघ वज्र क्यों नहीं छोड़ता? तुझे तो भगवान विष्णु का आशीर्वाद प्राप्त है, और तेरे हाथों में ऋषि दधीचि की तपस्या से युक्त शक्तिशाली वज्र भी है। उस वज्र के प्रहार से मैं अपने इस शरीर से मुक्त होकर भगवान में लीन हो जाऊँगा।

वृत्रासुर को भगवान के स्मरण से रोमांच हो आया। उसने प्रार्थना की – हे प्रभो! जैसे पक्षियों के पंख-विहीन बच्चे अपनी माँ की प्रतीक्षा करते हैं, भूखा बछड़ा अपनी माँ के दूध के लिए छटपटाता है, वैसे ही मैं भी आपसे मिलने के लिए छटपटा रहा हूँ।

‘रणभूमि में मैं वीरगति प्राप्त करूँगा और इस शरीर से मुक्त होकर भगवान में मिल जाऊँगा’, इस विचार से अति उत्साहित होकर वृत्रासुर ने इंद्र पर आक्रमण किया। इंद्र ने अपने वज्र से वृत्रासुर का एक हाथ काट डाला। इससे वृत्रासुर का क्रोध और बढ़ गया। उसने इंद्र पर भीषण आघात किया, जिससे इंद्र के हाथ से वज्र छूट कर वृत्रासुर के पास ही गिर पड़ा। यह देखकर चारों ओर हाहाकार मच गया। कहीं वृत्रासुर इंद्र को मार तो नहीं डालेगा?

वृत्रासुर के बल से लज्जित इंद्र को उसके पास जाकर वज्र उठाने का साहस नहीं हुआ।

तब वृत्रासुर ने कहा – इंद्र! अपना वज्र उठाओ। तुम्हें इस समय भगवान का आशीर्वाद प्राप्त है। मुझे देखो, तुमने मेरा एक हाथ काट दिया, फिर भी मैं युद्ध-धर्म निभाते हुए तुमसे लड़ रहा हूँ। यह युद्ध क्या है – एक जूए का खेल ही तो है? इसमें प्राणों की बाजी लगती है और बाणों के पासे डाले जाते हैं। इसमें पहले से कुछ नहीं पता होता कि कौन जीतेगा और कौन हारेगा!

वृत्रासुर का आदर करते हुए इंद्र ने अपना वज्र उठा लिया। इंद्र ने कहा – हे दानवराज! तुम अद्भुत हो! तुमने भगवान की माया से ऊपर उठकर भगवान की वह भक्ति पा ली है जो सामान्य जनों के लिए असंभव है।

फिर कई दिनों तक चले युद्ध में अंत में इंद्र ने अपना वज्र चला कर वृत्रासुर का सिर काट डाला। वृत्रासुर के शरीर से एक ज्योति निकली और भगवान में समा गई।

(मूल ग्रंथ श्रीमद्भागवत पुराण पर आधारित)

श्याम चतुर्वेदी

दिति के दो पुत्र थे- हिरण्याक्ष और हिरण्यकशिपु। जब वराह-अवतार लेकर भगवान ने हिरण्याक्ष को मार डाला तो उसके भाई हिरण्यकशिपु के क्रोध और शोक का ठिकाना नहीं रहा। उसने भरी सभा में अपने त्रिशूल को लहराते हुए यह घोषणा की – दैत्यो और दानवो! तुम्हें ज्ञात है कि मेरे शत्रु देवताओं ने मेरे प्यारे भाई हिरण्याक्ष को विष्णु से मरवा दिया है। यह विष्णु पहले देवताओं और दैत्यों दोनों के प्रति समान भाव रखता था। किंतु अब उसे देवताओं ने अपने पक्ष में कर लिया है। वह विष्णु उस अबोध बालक की तरह है जिसे कोई भी सेवा करके अपनी ओर कर ले। अब मैं अपने इस त्रिशूल से विष्णु का गला काटकर उसके रक्त से अपने भाई का तर्पण करूँगा। उस मायावी के नष्ट होते ही सारे देवता अपने-आप मर जाएँगे, जैसे वृक्ष की जड़ काट देने पर उसकी सारी डालियाँ  सूख जाती है।

फिर हिरण्यकशिपु ने दैत्यों को आज्ञा दी – तुम लोग पृथ्वी पर जाओ। वहाँ जहाँ-जहाँ यज्ञ, धर्म-कर्म, स्वाध्याय, व्रत, दान और अन्य शुभ कर्म होते हों, उन सारे स्थानों को नष्ट कर दो। न तो यज्ञ होगा न ही धर्म। तब विष्णु का प्रभाव भी कम हो जाएगा,  क्योंकि विष्णु की जड़ ही है धर्म और यज्ञ।

अपने स्वामी की आज्ञा पाकर दैत्य पृथ्वी पर गए और वहाँ जाकर उन्होंने नगर, गाँव, गौशाले, खेत-बगीचे, ऋषियों के आश्रम, किसानों की बस्तियाँ, व्यापार के सभी केंद्र देखते ही देखते उजाड़ डाले।

उधर हिरण्यकशिपु ने अपने भाई की अंत्येष्टि की और अपनी माता दिति, हिरण्याक्ष की पत्नी और उसके पुत्रों को सान्त्वना देते हुए कहने लगा- मेरी माँ, बहू और पुत्रो!वीर हिरण्याक्ष ने युद्ध में वीरगति पाई है। अब उसका स्थूल शरीर हमारे बीच नहीं रहा। उसके लिए अब शोक मत करो, क्योंकि आत्मा अविनाशी, शुद्ध और देह से अलग है। जैसे, प्याऊ (पानी पीने का स्थान) पर लोग कुछ देर के लिए इकट्ठा होते हैं और फिर चले जाते हैं, उसी तरह इस संसार में जीव भी कुछ समय के लिए साथ मिलते हैं और फिर बिछुड़ जाते हैं। जिन्हें आत्मा के स्वरूप का ज्ञान नहीं होता, उन्हें ही किसी की मृत्यु पर शोक होता है। इस बारे में एक पुरानी कथा है। तुमलोग इसे ध्यान से सुनो –

उशीनगर के अत्यंत यशस्वी राजा सुयज्ञ को युद्ध में उसके शत्रुओं ने मार डाला। उसके क्षत-विक्षत शरीर को देखकर उसकी रानियों और संबंधियों के दुख की सीमा नहीं रही। उनका विलाप इतना करूण था कि उसे सुनकर स्वयं यमराज वहाँ एक बालक के रूप में आए और उन्होंने उन लोगों से कहा – तुम लोगों ने बराबर मनुष्यों का मरना-जीना देखा है। फिर इसकी मृत्यु पर इतना शोक क्यों करते हो? रानियो! सभी प्राणियों की मृत्यु अपने पूर्व जन्मों के कर्मों के अनुसार समय पर होती है और उसके बाद उसका जन्म भी होता है। किंतु, आत्मा की न तो मृत्यु होती है और न ही जन्म। जैसे, बुलबुला पानी का विकार है, घड़ा मिट्टी का विकार है, गहना स्वर्ण का विकार है, इस तरह यह शरीर भी एक विकार मात्र है जो बनता-बिगड़ता रहता है। 

जैसे काठ में रहने वाली अग्नि उससे अलग है, देह में रहने वाली वायु उससे अलग है, जैसे आकाश सर्वत्र होने पर भी किसी के गुण-दोष से लिप्त नहीं होता, इसी तरह समस्त देह-इंद्रियों में रहने वाला आत्मा भी उनसे अलग है। तुम लोग जिस सुयज्ञ के लिए शोक कर रहे हो,  उसका शरीर तो तुम्हारे सामने पड़ा है। तुम लोग इसी को देखते थे। इसमें जो सुननेवाला, बोलनेवाला था, वह तो तुम्हें कभी दिखाई नहीं देता था। वह आज भी नहीं दिखाई दे रहा है। फिर शोक किसका? शरीर और आत्मा का तत्त्व जाननेवाले पुरुष न तो अनित्य शरीर के लिए शोक करते हैं न ही नित्य आत्मा के लिए। 

फिर बालक-रूप यमराज ने उन लोगों को एक बहेलिए की कहानी सुनाई – 

एक  बहेलिया था। उसने एक बार पक्षियों के एक जोड़े को फँसाने के लिए जाल फैलाई। संयोगवश उसमें मादा-पक्षी फँस गई। अपनी मादा की इस विपत्ति को देखकर नर-पक्षी ने विलाप करना शुरू किया कि विधाता की यह कैसी लीला है! अभी तो उनके बच्चों के पंख भी नहीं हुए हैं। वे मातृहीन बच्चे अपनी माँ की बाट देख रहे होंगे। मैं भी अपनी मादा से बिछड़ कर कैसे जिऊँगा? वह अभी इसी तरह विलाप कर ही रहा था कि पास ही छिपे हुए बहेलिये ने उसे ऐसा बाण मारा कि वह भी वहीं मर गया।

मूर्ख रानियो! तुम्हारी भी यही दशा होने वाली है। तुम्हें अपनी मृत्यु तो दीखती नहीं, तुम इसके लिए रो रही हो!  अब चाहे इसके लिए जितना भी शोक कर लो, यह दुबारा आने वाला नहीं है। 

बालक की ज्ञानप्रद बातों को सुनकर सबका शोक जाता रहा। 

हिरण्यकशिपु की इन बातों से अपनी पुत्रवधू के साथ दिति ने भी उसी क्षण पुत्र-शोक का त्याग कर दिया और अपना चित्त परम तत्त्व में लीन कर दिया। 

(मूल ग्रंथ श्रीमद्भागवत पुराण पर आधारित)

श्याम चतुर्वेदी 

हिरण्याक्ष की मृत्यु हो गई थी। भाई के वध से क्रोधित  हिरण्यकशिपु ने असुरों को पृथ्वी पर भेज कर समस्त यज्ञ आदि धार्मिक क्रियाकलापों को बलपूर्वक बंद करा दिया था जिससे देवताओं की शक्ति कम हो जाए।

फिर हिरण्यकशिपु के मन में यह विचार आया – मैं क्यों नहीं अजेय, अमर और सारे संसार का एकमात्र सम्राट बन जाऊँ? 

इस उद्देश्य से उसने मंदराचल की एक घाटी में जाकर तपस्या शुरू कर दी। जैसे-जैसे समय बीतता गया, उसकी तपस्या की उग्रता भी बढ़ती चली गई। उसकी तपस्या इतनी विकट थी कि देवताओं को घबराहट होने लगी। देवताओं ने ब्रह्मा के पास जाकर प्रार्थना की – हे जगत्पति ब्रह्माजी! हिरण्यकशिपु सृष्टि का सर्वोच्च पद पाने की अभिलाषा से इस समय घनघोर  तप कर रहा है। एक बार ऐसा पद पा लेने पर वह पाप और पुण्य आदि के सभी वर्तमान नियमों को पलट कर अपनी इच्छा के अनुसार विधि- नियम बना देना चाहता है। आप कृपया कुछ ऐसा करें जिससे उसकी निरंकुशता पर नियंत्रण लगे। 

देवताओं की प्रार्थना सुनकर ब्रह्मा जब हिरण्यकशिपु की तपस्या-स्थली पर पहुँचे तो उन्हें सहसा वह कहीं दिखाई नहीं पड़ा, क्योंकि उसका शरीर दीमक की मिट्टी, घास और वनस्पतियों से ढक गया था। फिर भी उन सब के भीतर से उसकी तपस्या का तेज ऐसे निकल रहा था जैसे बादलों से ढके हुए सूर्य की आभा दिखाई देती है।

हिरण्यकशिपु को देखकर ब्रह्मा भी विस्मित हो गए। उसका शरीर हड्डियों का ढाँचा भर रह गया था। ब्रह्मा ने उसके शरीर पर अपने कमंडलु का दिव्य जल छिड़का जिससे वह पूरी तरह स्वस्थ होकर उठ खड़ा हुआ। उस समय उसका सारा शरीर वज्र के समान कठोर और तपाये हुए सोने के समान चमकीला दिखाई देता था। 

ब्रह्मा ने कहा – बेटा, ऐसी कठिन तपस्या आज तक किसी ने नहीं की थी और न ही भविष्य में कोई कर सकेगा। तुम मुझसे वर माँगो।

हिरण्यकशिपु ने हाथ जोड़कर ब्रह्मा की स्तुति की और यह वर माँगा- हे प्रभो! आप मुझे ऐसा वर दीजिए कि आपके बनाए हुए किसी भी प्राणी के हाथों अथवा अन्य प्राणी के हाथों मेरी मृत्यु नहीं हो। मैं न तो घर के भीतर मारा जाऊँ न घर के बाहर, न तो दिन में न रात में, न भूमि पर न आकाश में, न तो कोई हथियार मेरे प्राण ले सके न मनुष्य न पशु। युद्ध में मेरा सामना करने वाला कोई न हो। मैं समस्त प्राणियों का एकमात्र स्वामी हो जाऊँ।

ब्रह्मा ने हिरण्यकशिपु की प्रार्थना सुनकर कहा – पुत्र! तुमने जो वर माँगे, वे जीवों के लिए बहुत दुर्लभ हैं। परंतु तुम्हारी तपस्या की शक्ति ने मुझे ये सारे वर देने को विवश कर दिया है। 

इस तरह ब्रह्मा से वर पाकर हिरण्यकशिपु ने शीघ्र ही तीनों लोकों और उनमें रहने वाले सारे प्राणियों पर अपना आधिपत्य जमा लिया। वह इंद्र को भगाकर उसके ऐश्वर्यपूर्ण  भवन में ही रहने लगा। उसका आतंक इतना था कि ब्रह्मा, विष्णु और महादेव के अतिरिक्त समस्त देव और दानव उसके चरणों की वंदना करते थे। सारी प्रकृति उसकी इच्छा के अनुसार वस्तुएँ प्रदान करती थी। 

इस तरह समस्त विषयों का उपभोग करते हुए हिरण्यकशिपु के जीवन का बहुत-सा समय बीत गया। साथ ही, उसके कठोर शासन से समस्त लोकों के निवासियों का धैर्य टूटता गया। उन्होंने तब मन को एकाग्र करके भगवान पर ध्यान लगाया और उनसे इस भयानक क्रूर शासक से मुक्ति दिलाने की प्रार्थना की। 

भगवान ने उन्हें अभयदान देते हुए कहा- तुम लोगों का कल्याण हो! मैं इस नीच के बारे में सब कुछ जानता हूँ। मैं इसका नाश कर दूँगा। कुछ दिनों तक प्रतीक्षा कर लो। कोई भी प्राणी जो मुझसे या मेरे भक्तों से द्वेष करने लगता है तो उसका विनाश अवश्य होता है। जब यह दुष्ट अपने निर्दोष और महात्मा पुत्र प्रह्लाद से वैर करेगा और उस पर बहुत अत्याचार करेगा, तब ब्रह्मा के वरदान के कारण शक्ति-संपन्न होने पर भी मैं इसे मार डालूँगा। 

(अगले अंक में – प्रह्लाद का चरित्र और भगवान का नरसिंह अवतार)

(मूल ग्रंथ श्रीमद्भागवत पुराण पर आधारित)

श्याम चतुर्वेदी